आज की कहानी: यादें
सुन, आज मार्किट में तेरी रेनू मैडम मिलीं थीं। वही जो तुझे टेंथ में मैथ्स पढ़ाया करती थीं। खूब याद कर रहीं थीं, बुला रहीं थीं। किसी दिन हम दोनों उनसे मिलने चलेंगें।"
"मेरे पास इधर उधर जाने के लिए फ़ालतू का टाइम नहीं है। आपको पता है ना मेरा टाइम कितना कीमती है।" मैं बिफ़र पड़ा। आए दिन माँ का यही सब चलता रहता है। कभी अपने पास बिठलाकर खाना खाने को बोलेंगी, कभी पार्क में साथ टहलने को। रात में तो अक्सर वो मुझे टी वी देखने के बहाने सारे दिन की बातें सुनाने के लिए अपने पास बुलाएंगी। पता नहीं क्या चाहती हैं। बड़ा हो गया हूँ, जरा सा लल्ला नहीं हूँ, जो हरदम उनके आगे-पीछे घूमता रहूँ।
"बेकार का टाइम नहीं है। बहुत कीमती है मेरा टाइम।"
हर बार ऐसा ही टका सा जवाब देकर पल्ला झाड़ लेता। माँ भी हर बार सुना अनसुना करके अपने काम में लग जातीं पर आज माँ को शायद कुछ बुरा, बहुत बुरा सा लगा। वो चुपचाप अपने कमरे में चली गयीं।
कुछ ही देर में अपने कमरे से हाथ में थैली लिए बाहर आयीं और मेरे करीब बैठकर मुझसे बोलीं,— "बहुत कीमती है ना तेरा टाइम। ये देख मेरे पास भी कुछ कीमती सा है........ये कीमती यादें।"
कहते हुए माँ ने थैली से निकालकर कुछ चीज़ें मेरे लैपटॉप के बगल में रख दी।
"ये देख तेरी वो शर्ट जिसे तू पहन कर पहली बार स्कूल गया था.....कितना रोया था उस दिन मुझ से लिपट कर। ये घड़ी जो मैंने तेरे दसवें जन्मदिन पर दी थी और ये पैन बाहरवीं में तब दिया था जब तूने टॉप किया था। शायद तेरे लिए ये पुरानी-धुरानी चीजें होंगी पर इनमें मेरी कीमती यादें बसीं हैं और उन यादों में बसा हुआ है तू।"
कहते हुए माँ रुआँसी सी हो गयी और वहाँ से चली गयी।
मेज पर फैली बिखरी उन चीजों को छूने का बड़ा मन किया। छुआ.....उस छुअन में एक खिंचाव सा था जो मुझे मेरे बचपन के सुनहरे दिनों में खींचे लिए जा रहा था। उन सारी चीज़ों को उठाकर मैंने अपने सीने से लगा लिया सीने में दिल और उन चीज़ों में यादों की धड़कन को साफ़-साफ़ महसूस कर रहा था फ़ौरन उठा और माँ के पास चल दिया। मुझे देखकर भी अनदेखा करती माँ उधड़े कपड़ों की तुरपाई में लगी रही।
"सॉरी माँ, जाने अनजाने कितनी बार तुम्हारा दिल दुखाया है मैंने। माफ कर दो ना। समझ गया वक्त कीमती होता है पर जो वक्त अपनों के साथ बीते वो बेशकीमती होता है।"
मेरी आँखों में शर्म और माँ की आँखों में आँसू, चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी। कुछ नहीं बोलीं, बस हौले से मेरे गाल पर चपत लगा दी। जिस हक से माँ ने चपत लगाई, उसी हक से मैं भी माँ को मनाने लगा।
"माँ, चलो ना आज घंटाघर चलते हैं कुल्फी खाने, वहीं पास में मैम का घर है, मिलते आयेंगे।"
बनावटी ना नुकर के बाद माँ झट से चलने को राजी भी हो गई। पहले मैंने मेज पर बिखरी उन कीमती यादों को सहेज कर अपने पास रखा और फिर चल पड़ा माँ के साथ आने वाले उन पलों को जीने के लिए जो भविष्य में गवाह बनेंगें हम दोनों की बेशकीमती यादों के।
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