एक शिक्षक था।
दूर दराज के गांव में नौकरी थी। सैलरी अच्छी थी, गांव में खर्चा कम, जिंदगी मजे में थी। गांव में एक सिद्ध बाबा ने मुकाम किया।
शिक्षक महोदय चेला बन गए, अच्छी सेवा की। जाते वक्त बाबा ने शिक्षक महोदय को खुश होकर एक तावीज दिया। कहा इसे चूमकर जो मांगोगे, मिलेगा।
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तावीज पाने के एक हफ्ते बाद की बात है। एक मामले की जांच में थानेदार गांव आया। गुरुजी ने थानेदार को देखा।
भई, क्या रुआब, क्या शान, जिसे चाहे डंडा लगा थे, बन्द कर दे। कामना जागी, काश मैं थानेदार होता।
तभी ताबीज की याद आयी। भागे भागे गए, तावीज चूमा था ..
कि वो थानेदार बन गये।
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थानेदार बन इठलाता घूमे। इसको डांट, उसको डंडा। खूब धौस थी।
लेकिन रेंज के डीआईजी का विजिट हुआ। अनुभवहीन थानेदार से डीआईजी ने कुछ सवाल किए। जवाब न मिला तो जमकर धोया। थानेदारी धरी की धरी रह गयी।
लेकिन कामना तो जागी।
तावीज चूमा- ए तावीज मुझे डीआईजी बना दे। बन गया। अब डीआईजी साहब रोब गांठते घूमते, सारे थानेदारों की क्लास लेते।
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लेकिन फिर एक दिन गृहमन्त्री के घर सुरक्षा ड्यूटी मिल गयी।
तो डीआईजी साहब, मंत्राणी जी को सब्जी बाजार लेकर जाते-आते। तिस पर हर शाम मंत्री जी, सही से पैग न बनने पर गाली भी दे देते।
इस श्वान जीवन से दुखी होकर डीआईजी ने कहा, है तावीज, कुछ बनाना है तो गृहमन्त्री बना दो। तावीज तो जादुई था, बन्दा गृहमंत्री बन गया, इतराने लगा। एक दर्जन डीआईजी सुरक्षा में लगा लिये।
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कि एक दिन राज्य में राष्ट्रपति का दौरा हुआ। क्या झूमा झटकी, क्या ताम झाम..
क्या ही शान।
किसी गृहमंत्री को इतनी शान कहां नसीब, उसे तो ताबेदार की तरह आगे पीछे होना था। महामहिम, महामहिम रटना था।
तो होना जो था, वो हुआ,
कामना जागी।
हे तावीज..
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राष्ट्रपति भवन में एक माह बड़े मजे से गुजरा। 350 कमरों का पैलेस, शानदार बाग बगीचे, शाही ठाठ, पांच सौ नौकर चाकर, आठ हजार करोड़ का निजी हवाई जहाज।
मजे ही मजे।
महीना खत्म हुआ, सैलरी मिली, टैक्स में पौने तीन लाख कट गए।
अब राष्ट्रपति ने महसूस किया, टीचर की तो बचत ज्यादा होती है।
वो तावीज की ओर बढ़ा...
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मगर सुना है, उस बार
ताबीज ने चिढ़कर उसे, दो कौड़ी के किसी आयोग का अध्यक्ष बना दिया है।
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