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 भाभी तो बुखार का नाटक करके काम से बचना चाहती है!!

मेरी जेठानी साल में बस एक बार ससुराल आती थी, त्योहार पर या किसी खास मौके पर। आते ही पूरे घर में उसकी आवभगत होती, जैसे कोई मेहमान आई हो। सासू माँ उसके लिए अलग नाश्ता बनवातीं, ससुरजी खुद बाजार से फल लाते और ननद तो जैसे उसकी परछाईं बन जाती। “भाभी आप रहने दो, मैं कर लूंगी”, “भाभी आप थक जाओगी”, “भाभी आपकी तबीयत खराब न हो जाए” — ये सब बातें मैं रोज़ सुनती थी। लेकिन जब बात मेरी आती, तो हालात बिल्कुल उलट थे। मुझे हर महीने मायके से ससुराल बुला लिया जाता, कभी त्योहार के नाम पर, कभी रिश्तेदारों के आने पर, और कभी सिर्फ इसलिए कि “घर की बहू हो, जिम्मेदारी तो तुम्हारी ही है।”
ननद का रवैया मेरे साथ हमेशा तानों से भरा रहता था। उसे लगता था कि मैं जानबूझकर काम से बचने के बहाने ढूंढती हूँ। चाहे मैं थकी हुई होऊँ, चाहे बुखार में तप रही होऊँ, उसकी नज़र में मैं हमेशा नाटकबाज़ थी। “देखो माँ, भाभी को हर बार कुछ न कुछ हो जाता है”, “जब भी काम ज्यादा होता है, इन्हें बुखार आ जाता है”, “लगता है काम से बचने की पूरी ट्रेनिंग लेकर आई हैं” — उसकी ये बातें मेरे दिल में किसी कांटे की तरह चुभती रहतीं। मैं कुछ कहती नहीं थी, क्योंकि मुझे सिखाया गया था कि घर की शांति के लिए बहू को चुप रहना चाहिए।
उस दिन मेरी तबीयत सुबह से ही ठीक नहीं थी। शरीर टूट रहा था, सिर भारी लग रहा था और आँखों के आगे अंधेरा सा छा रहा था। मैंने हिम्मत करके सासू माँ से कहा, “माँ, आज बुखार लग रहा है, अगर थोड़ा आराम मिल जाए तो…” मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि ननद बीच में बोल पड़ी, “अरे वाह! फिर शुरू हो गया नाटक। माँ, देख लेना, ये सब काम से बचने के बहाने हैं।” सासू माँ ने मेरी तरफ देखा, फिर ननद की तरफ, और बोले बिना कुछ कहे बस इतना कहा, “काम तो करना पड़ेगा बहू, घर का काम रुकता नहीं है।”
मैं डर गई। मुझे डर था ननद के तानों का, सासू माँ की नाराज़गी का और उस बदनामी का जो मेरे नाम के साथ जोड़ दी जाती — कि भाभी कामचोर है। इसलिए मैंने चुपचाप रसोई में कदम रख दिया। चूल्हे की गर्मी, तेल की गंध और शरीर की कमजोरी — सब मिलकर मुझे और बेहाल कर रहे थे। कचौड़ियाँ बन रही थीं क्योंकि ननद के ससुराल से मेहमान आने वाले थे। मैंने कड़ाही में तेल डाला, आटा बेलते हुए हाथ काँप रहे थे, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ता था।
जैसे-जैसे समय बीत रहा था, मेरा बुखार बढ़ता जा रहा था। पसीना बह रहा था, लेकिन ठंड भी लग रही थी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कीं और तभी तेज़ चक्कर आया। हाथ से कचौड़ी छूट गई और अगले ही पल मेरा संतुलन बिगड़ गया। गर्म तेल से भरी कड़ाही मेरी तरफ झुकी और उबलता हुआ तेल मेरे हाथ और बाजू पर गिर पड़ा। चीख मेरे मुँह से अपने आप निकल गई। रसोई में अफरा-तफरी मच गई। लेकिन उस चीख में सिर्फ दर्द नहीं था, सालों की चुप्पी और अपमान भी शामिल था।
सासू माँ और ननद दौड़कर आईं। ननद ने एक पल को देखा और फिर बोली, “ये भी कोई तरीका है ध्यान खींचने का?” लेकिन जब मेरे हाथ की हालत सबने देखी, तो उसके चेहरे का रंग बदल गया। छाले पड़ चुके थे, त्वचा लाल हो चुकी थी और दर्द असहनीय था। सासू माँ की आवाज़ काँप गई। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि बुखार कोई बहाना नहीं था, कमजोरी कोई नाटक नहीं था।
मुझे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा कि अगर थोड़ी देर और हो जाती तो जलन और गहरी हो सकती थी। पट्टी करते वक्त मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वो आँसू सिर्फ जलन के नहीं थे। वो आँसू उस बेबसी के थे जो एक बहू हर रोज़ महसूस करती है, जब उसकी तकलीफ को नाटक समझ लिया जाता है और उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी।
अस्पताल के बाहर सासू माँ चुपचाप बैठी थीं। ननद भी खामोश थी। शायद पहली बार उसे एहसास हुआ था कि हर औरत जो दर्द में होती है, वो बहाना नहीं बना रही होती। कुछ देर बाद सासू माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “बहू, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई।” वो शब्द मेरे लिए किसी मरहम से कम नहीं थे।
उस दिन के बाद घर का माहौल बदला। मुझे आराम दिया गया, मेरे काम कम किए गए और सबसे बड़ी बात — मेरी बात सुनी जाने लगी। ननद भी अब ताने देने से पहले सोचने लगी। मैं जानती हूँ कि हर घर में सब कुछ अचानक नहीं बदलता, लेकिन कभी-कभी एक हादसा लोगों की आँखें खोल देता है।
आज भी मेरे हाथ पर उस जलन का निशान है। लेकिन वो निशान मुझे कमजोर होने का एहसास नहीं कराता, बल्कि याद दिलाता है कि अपनी तकलीफ को बोलना भी ज़रूरी है। हर बहू नाटक नहीं करती, कुछ सच में टूट चुकी होती हैं — बस चुपचाप।
क्योंकि चुप्पी हर बार सहमति नहीं होती,
कभी-कभी वो मजबूरी होती है। दोस्तो आगर आपको ये कहानी अच्छी लगी हो तो लाइक शेयर और फॉलो जरूर करे!

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