रिया, अब बहुत हो गया।
समाज में हमारी भी इज़्ज़त है। लोग पूछते हैं बहू कहाँ है। तीन साल बाद आज पहली बार करण मेरे सामने बैठा था। वही आदमी, जिसके साथ सात फेरे लेकर मैंने पूरी ज़िंदगी बिताने का सपना देखा था… और वही आदमी, जिसने उन सपनों को रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ा था। आज वो अपने माता-पिता के साथ मेरे मायके आया था — “समझौते” की बात करने।
कमरे में सन्नाटा था। पापा की उँगलियाँ बेचैनी में सोफ़े के हत्थे पर चल रही थीं। माँ मेरे पास बैठी थीं, और मेरी छह साल की बेटी काव्या मेरी गोद में चुपचाप सिर टिकाए थी, जैसे उसे भी महसूस हो रहा हो कि आज कोई बड़ा फैसला होने वाला है।
करण की माँ ने बातचीत शुरू की — “रिया, अब बहुत हो गया। समाज में हमारी भी इज़्ज़त है। लोग पूछते हैं बहू कहाँ है। काव्या को बाप का नाम चाहिए। तुम पढ़ी-लिखी हो, समझदार हो… थोड़ी सहनशीलता रखो।”
मैंने उनकी ओर देखा। कितनी आसानी से उन्होंने “सहनशीलता” शब्द बोल दिया — जैसे वो कोई हल्की-सी चादर हो, जिसे ओढ़ लेना भर हो। मैंने गहरी साँस ली और बोली — “माँजी, मैंने सात साल सहनशीलता में ही गुज़ारे हैं।”
शादी के शुरुआती महीने अच्छे थे। मैं भी नौकरी करती थी, करण भी। हम दोनों की आय मिलकर अच्छा घर चला सकती थी। लेकिन धीरे-धीरे करण के भीतर का असुरक्षित आदमी सामने आने लगा। उसे मेरी तरक्की से दिक्कत होने लगी।
ऑफिस में प्रमोशन मिला, तो उसने बधाई देने के बजाय कहा — “ज़रूर बॉस को खुश किया होगा।” उस दिन पहली बार मेरे आत्मसम्मान को चोट लगी। मैंने हँसकर टाल दिया, सोचा मज़ाक होगा। लेकिन वो मज़ाक रोज़ का ताना बन गया।
सुबह मैं पाँच बजे उठती। घर का काम, नाश्ता, टिफ़िन, सफ़ाई — सब करके ऑफिस जाती। लौटकर फिर वही रसोई, वही ज़िम्मेदारियाँ। करण टीवी के सामने बैठकर कहता — “तुम औरतें बाहर जाकर दो पैसे क्या कमा लेती हो, खुद को आसमान समझने लगती हो।”
अगर कभी थकान में चुप रह जाती, तो सुनना पड़ता — “तेवर देखो इसके।” धीरे-धीरे ताने आवाज़ में बदल गए, आवाज़ धक्कों में, और धक्के थप्पड़ में।
पहली बार जब उसने हाथ उठाया, तो मैं स्तब्ध रह गई। कारण? सिर्फ़ इतना कि मैंने कहा था — “आज बहुत थक गई हूँ, खाना बाहर से मँगवा लेते हैं।” उसके हाथ का निशान मेरे गाल पर कम, मेरे विश्वास पर ज़्यादा पड़ा था। उस रात उसने माफ़ी भी माँगी। कहा ग़ुस्से में हो गया। मैंने विश्वास कर लिया। क्योंकि हमें सिखाया जाता है — “घर बचाना है।”
फिर मैं माँ बनने वाली थी। मैंने सोचा, बच्चा आएगा तो सब बदल जाएगा। पर बदला सिर्फ़ मेरा जीवन। गर्भावस्था में भी मुझे आराम नसीब नहीं हुआ। उल्टियाँ, चक्कर, कमजोरी — सब “नाटक” कहलाया। डॉक्टर ने तनाव से बचने को कहा, लेकिन घर में हर दिन तनाव ही था। एक दिन ग़ुस्से में उसने मुझे धक्का दिया, और मैं गिर पड़ी। उस दिन मुझे पहली बार अपने बच्चे के लिए डर लगा।
काव्या के जन्म के बाद भी कुछ नहीं बदला। रात भर जागना, दिन भर काम करना — और ऊपर से ताने। “बच्ची रो क्यों रही है?”, “तुम्हें संभालना नहीं आता”, “नौकरी छोड़ो, घर बैठो”… लेकिन नौकरी छोड़ना मेरे लिए सिर्फ़ आर्थिक फैसला नहीं था, वो मेरी पहचान थी। मैंने मना किया। बस फिर क्या था — हर दिन मानसिक प्रताड़ना, शक, आरोप।
एक दिन ऑफिस में मीटिंग देर तक चली। घर पहुँची तो दरवाज़ा देर से खोला गया। अंदर कदम रखते ही सवालों की बौछार — “किसके साथ थी?”, “इतनी सज-धज क्यों?” मैंने समझाने की कोशिश की, पर उसने सुना नहीं।
उस रात उसने मुझे इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि मैं दीवार से टकरा गई। काव्या रो रही थी। मैं उसे उठाने बढ़ी, तो उसने चिल्लाकर कहा — “बच्चे को मुझसे दूर मत करो!”
उस पल मुझे एहसास हुआ — अगर मैं आज भी चुप रही, तो मेरी बेटी यही सीखेगी कि माँ का अपमान सामान्य है।
अगली सुबह मैंने माँ को फोन किया। आवाज़ काँप रही थी। शब्द टूट रहे थे।
माँ ने सिर्फ़ इतना कहा — “बेटी, अब बस।” उसी शाम पापा आ गए। बिना शोर, बिना तमाशे, मुझे और काव्या को साथ ले आए। उस घर से निकलते वक्त मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्योंकि जिस घर में इज़्ज़त न हो, वो सिर्फ़ चार दीवारें होती हैं।
शुरुआत मुश्किल थी। लोग बातें बनाते। रिश्तेदार समझाते — “समझौता कर लो।” पर मैंने पहली बार खुद को प्राथमिकता दी। दोबारा नौकरी शुरू की। किराए का छोटा-सा फ्लैट लिया।
काव्या को स्कूल में दाख़िला दिलाया। हर महीने की EMI, हर दिन की भागदौड़ — सब आसान नहीं था। लेकिन एक सुकून था — अब कोई मुझे नीचा नहीं दिखाता, कोई मुझ पर हाथ नहीं उठाता।
और आज… तीन साल बाद… वो लोग “समझौते” की बात लेकर आए थे।
करण ने धीमी आवाज़ में कहा — “रिया, मैं बदल गया हूँ। एक मौका दे दो।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ अपराधबोध कम, डर ज़्यादा था — अकेले रह जाने का डर।
मैंने शांत लेकिन ठोस आवाज़ में कहा — “मौका तब दिया जाता है, जब गलती एक बार हो।
आदत को मौका नहीं दिया जाता। तुमने सिर्फ़ मुझे नहीं, मेरे आत्मसम्मान को तोड़ा है। और अब मैं अपनी बेटी को ये नहीं सिखा सकती कि औरत को सब सहना चाहिए।”
करण की माँ बोलीं — “बेटी, औरत का घर तो उसका ससुराल ही होता है।”
मैंने दृढ़ता से जवाब दिया — “औरत का घर वहाँ होता है जहाँ उसे सम्मान मिले। जहाँ उसका डर नहीं, उसकी हँसी गूँजे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने आख़िरी बात कही —
“मैंने सात साल चुप रहकर देख लिया। अब मैं अपनी बेटी के लिए जीना चाहती हूँ — उसे सिखाना चाहती हूँ कि औरत होना कमज़ोरी नहीं है।
जब गलती मेरी नहीं थी, तो सज़ा मैं क्यों भुगतूँ?
अब फैसला कोर्ट करेगा। और मैं बिना डरे वहाँ जाऊँगी।”
मैंने काव्या का हाथ थामा। वो मुस्कुराई।
उसकी मुस्कान में मेरा साहस था।
और उस दिन मुझे समझ आया —
औरत तब तक कमज़ोर लगती है, जब तक वो चुप रहती है।
जिस दिन वो बोलना सीख जाए…
उसी दिन उसकी असली ताक़त शुरू होती है।
Post a Comment