भैया भाभी का काम भी तो किया है, तो हमारा भी करो
* भैया भाभी का काम भी तो किया है, तो हमारा भी करो *
" बेटा अपनी जिम्मेदारी अब तुम लोग खुद उठाओगे। आखिर कब तक हम तुम्हारी जिम्मेदारी उठाते रहेंगे। कम से कम अपने पापा की और मेरी उम्र पर तो तरस खाओ"
जानकी जी ने कहा।
" क्या मम्मी। तुम फिर वही बात लेकर बैठ गई। कितनी बार
कहा है आपको कि घर में शांति रहने दिया करो। जब देखो बस एक ही बात लेकर बैठ जाती हो "
मयंक ने चिढ़ कर कहा।
" पर बेटा, क्या तुझे हमारी उम्र पर तरस नहीं आता। हमने पहले भी सारे काम किए हैं। और अभी भी तुमने काम की सारी जिम्मेदारी हम पर डाल रखी है। अब कम से कम अपनी गृहस्थी तो खुद संभालो "
जानकी जी ने दोबारा कहा।
" मम्मी आपको भैया भाभी के परिवार को संभालने में एतराज नहीं था। लेकिन हमारे परिवार को संभालने में ऐतराज है। ऐसा दोहरा व्यवहार क्यों?"
मयंक ने कहा।
" मयंक तू समझता क्यों नहीं.."
" मम्मी मुझे अभी इस बारे में कोई बात नहीं करनी है। आपको टिफिन देना है तो दीजिए। वरना हम बाहर ही कुछ खा लेंगे। जब देखो बस काम धंधे के टाइम पर आप ये बातें लेकर बैठ जाती हो "
मयंक गुस्सा करते हुए बोला।
" पर बेटा, अगर बहू मदद नहीं कर सकती तो कम से कम एक काम वाली तो लगा लो। ताकि मुझे कुछ मदद मिल जाए। घर के काम के साथ-साथ प्रिंस की जिम्मेदारी भी तो मेरे ऊपर है"
जानकी जी ने कहा।
" मम्मी पापा है तो सही आपकी मदद के लिए। आप दो लोग मिलकर भी ये सब नहीं संभाल सकते"
मयंक ने कहा।
" मयंक मुझे देर हो रही है। चलना है तो चलो। वरना मैं कैब से रवाना हो जाऊंगी "
अचानक बहु गरिमा ने अंदर से आते हुए कहा।
" देखा हो गए ना लेट। आपको भी घर की शांति रास नहीं आती है। अब रखिए अपना टिफिन अपने पास "
कहकर मयंक गरिमा को लेकर वहां से रवाना हो गया। दोनों के जाते ही जानकी जी वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई। इतने में उनके पति सुदेश जी उनके लिए चाय बनाकर ले आए और उन्हें चाय देते हुए बोले,
" कर ली बात अपने बेटे से? मुझे तो पता था यही होगा। उसने तुम्हारी बात सुनी ही नहीं"
" आखिर क्यों नहीं समझते हैं ये लोग। अरे हमारी भी एक उम्र है। हमेशा हर बात में अपने बड़े भैया भाभी से तुलना करता रहता है। बस एक ही बात। बड़े भैया भाभी का किया है, तो हमारा भी करो"
जानकी जी ने कहा।
" अरे तुम पहले चाय तो पियो। यह सब बात हम बाद में करेंगे"
कह कर सुदेश जी उन्हें चाय देकर अपनी चाय लेकर बैठे ही थे कि इतने में प्रिंस के रोने की आवाज आ गई।
" लो पी लो चाय"
जानकी जी ने कहा और उठकर प्रिंस के पास चली गई।
सुदेश जी वहीं सोफे पर बैठकर सोचने लगे,
" कुछ ना कुछ तो अब करना ही पड़ेगा। भला ऐसे कैसे काम चलेगा। बेटे बहु तो नौकर रखने के पक्ष में भी नहीं थे। और उनकी उम्र का लिहाज भी नहीं कर रहे थे।
सुदेश जी और जानकी जी के दो बेटे बहू थे। बड़े बेटे बहु समीर और मनीषा दूसरे शहर में रहते थे। जो नौकरी के कारण दूसरे शहर में आठ साल पहले ही शिफ्ट हुए थे। इससे पहले वो लोग यही सुदेश जी और जानकी जी के पास रहते थे। तब मयंक की शादी नहीं हुई थी।
समीर और मनीषा की शादी समय पर हो गई थी। उनके दो जुड़वा बच्चे थे। मनीषा भी नौकरी नहीं करती थी। इसलिए उस समय जानकी जी और मनीषा ने मिलकर सब कुछ
संभाल रखा था। मयंक की शादी के कुछ दिन बाद ही
समीर और मनीषा दूसरे शहर शिफ्ट हो गए थे।
एक तो मयंक की शादी लेट हुई। ऊपर से शादी के पांच साल तक मयंक और गरिमा ने अपने कैरियर के कारण बच्चा न करने का फैसला लिया।
आखिर इन सब में माता-पिता की उम्र थोड़ी ना रुक रही थी। अब दोनों ये उम्मीद करते थे कि जैसा भैया भाभी के लिए मम्मी पापा ने सब कुछ किया, वैसा हमारे लिए भी करें। पर दोनों ये दिमाग नहीं लगा रहे थे कि मनीषा घर पर रहकर ही
जानकी जी के साथ घर संभालती थी। पर गरिमा तो नौकरी करती है।
और यदि इस बारे में जानकी जी कुछ कहती है तो दोनों यही जवाब देते हैं कि बहू नहीं है तो क्या हुआ? अब पापा जी घर पर ही तो रहते हैं। अभी भी तो आप दो लोग ही हो।
खैर, शाम को जब मयंक और गरिमा घर पहुंचे तो सुधीर जी अपना और जानकी जी का सामान पैक करके तैयार थे। दोनों को सामान के साथ देखकर मयंक ने कहा,
" पापा आप लोग कहीं जा रहे हो क्या?"
" हां बेटा, हम तेरे भैया भाभी के पास जा रहे हैं। सोचा कुछ दिन उनके पास भी रह आए"
" पर पापा जी हमारी छुट्टी तो नहीं है। ऐसे कैसे आपने अचानक से प्रोग्राम बना लिया? फिर यहां प्रिंस को कौन संभालेगा "
गरिमा ने कहा।
ये सुनकर मयंक ने भी कहा,
" हां पापा, एक बार पूछ तो लेते हमसे। अब अचानक कैसे मैनेज होगा सब कुछ "
" और फिर मुझे तो नहीं लगता कि आपने अभी घर का कोई काम किया होगा। मैं प्रिंस को संभालूंगी, घर का काम करुंगी या फिर जॉब करूंगी?"
गरिमा चिढ़ते हुए बोली।
" बहु चिंता मत कर। उसका बंदोबस्त हमने कर दिया है"
अचानक सुदेश जी बोले।
ये सुनकर मयंक और गरिमा हैरानी से उनकी तरफ देखने लगे। इतने में सुदेश जी बोले,
" बहु हमने तुम्हारे मम्मी पापा को बुला लिया है। अब जब तक हम लोग यहां नहीं आएंगे, वो लोग यहां पर रुक जाएंगे। तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। तुम पहले की तरह काम पर जा सकती हो "
" फिर घर का काम?"
गरिमा ने धीरे से कहा।
" कोई बात नहीं बहू। तुम्हारी मम्मी कर लेगी। वो तो वैसे भी उम्र में मुझसे छोटी है। चुटकियों में काम निपटाएंगी। आखिर उन्होंने तुम्हारे भैया भाभी का भी किया है तो तुम्हारा भी कर देंगी"
जानकी जी ने कहा।
" अरे अब चलो भी। देर हो रही है हमें। समधी समधन जी आ जाएंगे। हमारी बस का समय हो गया है "
सुदेश जी ने कहा तो जानकी जी उनके साथ रवाना हो गई।
इधर जब गरिमा के मम्मी पापा घर पर आए तो गरिमा और मयंक किस मुंह से उन्हें घर के काम के
लिए कह दे। इसलिए जब उसकी मम्मी प्रिंस को संभाल रही थी तो गरिमा ने जैसे तैसे खाना बनाया। जैसे तैसे चिड़चिड़ाते हुए गरिमा ने रात का काम निपटाया।
दूसरे दिन सुबह भी सब कुछ गड़बड़ हो रहा था।
क्योंकि सारा काम गरिमा को ही करना था। हालांकि मम्मी फिर भी किचन में थोड़ा बहुत काम संभाल रही थी। पर उनसे भी जितना हो पा रहा था, उतना ही कर रही थी।
आखिर अपने घर में तो आपको काम का पूरा अंदाजा होता है। पर दूसरे के घर में वक्त लगता है।
लेकिन दो दिन में ही उसके मम्मी पापा को अच्छे से अंदाजा हो गया कि घर कौन संभालता है।
आखिरकार जब तीसरे दिन सब्र का बांध टूटा तो मयंक और गरिमा आपस में ही लड़ पड़े। दोनों को लड़ते देखकर उसकी मम्मी डांटते हुए बोली,
" ये क्या हरकत है? अपने ही घर का काम तुम दोनों को बोझ लग रहा है"
" तो क्या करूं मम्मी? इनके मम्मी पापा ने जानबूझकर ये सब किया है। अचानक भैया भाभी के घर जाने का फैसला कर लिया। यह जानते हुए कि मैं नौकरी करती हूं। यहां घर भी संभालना होता है, बच्चा भी संभालना होता है, आखिर
अकेले कैसे करूंगी "
गरिमा बिफरते हुए बोली।
" वैसे ही करोगी, जैसे तुम्हारे सास ससुर अकेले करते हैं। शर्म नहीं आती तुम लोगों को। इस उम्र में उनसे अकेले सारा काम करवाते हुए। अरे दोनों मिलकर कमाते हो।
क्या घर में नौकरानी नहीं लगा सकते। जब तुम जैसे जवान लोगों को ये सब बोझ लग रहा है तो बेचारे वो बुजुर्गों को बोझ नहीं लगता होगा"
पापा ने डांटते हुए कहा।
" पर उन्होंने भैया भाभी का भी तो अकेले ही किया है"
अचानक मयंक और गरिमा के मुंह से एक साथ निकला।
" अरे तब उनकी उम्र कुछ और थी। अभी उनकी उम्र कुछ और है"
आखिर जब पापा मम्मी ने डांटा तो दोनों को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने घर में काम करने वाली रख ली। आखिर एक सप्ताह बाद जब सुधीर जी और जानकी जी घर आए तो घर में कामवाली को देखकर खुश हो गए।
आखिर मयंक और गरिमा ने अपने किए के लिए माफी मांग ली।
मौलिक व स्वरचित
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