(सत्य घटना पर आधारित) 🌐🌐🌐🌐🌐🌐
आलम साहब एक प्राइवेट कंपनी में अच्छी नौकरी करते हैं। उम्र पैंतालीस साल।
एक दिन आलम साहब एक अभिजात रेस्तराँ में दोपहर का भोजन करने बैठे। मेज़ पर चावल, सब्ज़ी और सलाद बहुत सुंदर ढंग से सजाकर परोसा गया था। पुलाव-बिरयानी नहीं, उन्हें सादा चावल ही पसंद है। और चम्मच से नहीं, हाथ से खाना उन्हें ज़्यादा सहज लगता है।
वे जैसे ही पहला कौर मुँह में उठाने वाले थे, तभी उनकी नज़र रेस्तराँ की काँच की दीवार पर पड़ी। उन्होंने देखा, काँच के उस पार पाँच-छह साल की एक अत्यंत गरीब बच्ची उदास आँखों से रेस्तराँ के ग्राहकों को खाते हुए देख रही है। बच्ची का सूखा चेहरा बता रहा था कि उसने दोपहर का खाना नहीं खाया है। लगता नहीं था कि सुबह भी उसने ठीक से कुछ खाया हो।
आलम साहब ने कौर मुँह में नहीं उठाया। उन्होंने हाथ के इशारे से बच्ची को बुलाया। बच्ची पहले समझ नहीं पाई कि उसे बुलाया जा रहा है, क्योंकि किसी रेस्तराँ के ग्राहक ने कभी उसे अंदर नहीं बुलाया था। इसलिए शुरू में उसने सोचा कि शायद किसी और को बुलाया जा रहा है। लेकिन थोड़ी देर बाद जब उसे समझ आया कि अंदर बैठा वह आदमी उसी को बुला रहा है, तो वह सहमी-सी रेस्तराँ के भीतर आ गई।
बच्ची के सिर पर बिना तेल के बिखरे हुए बाल, बदन पर गंदी और फटी हुई फ्रॉक, धूल से भरे नंगे पैर और शरीर से आती तीखी बदबू। वह डरते-डरते आलम साहब की मेज़ के पास आई। रेस्तराँ के अन्य ग्राहक हैरानी से उसे देखने लगे। इतना चमचमाता हुआ रेस्तराँ और ऐसी गंदी, फटी पोशाक में, धूल से भरे पैरों और बदबू के साथ कोई बच्ची अंदर आ जाए—यह उन्होंने सोचा नहीं था। कुछ ग्राहकों की आँखों में साफ़ झुंझलाहट थी, मानो उनका खाना खराब हो गया हो।
उनमें से एक ने रेस्तराँ के एक वेटर को बुलाकर कहा,
“तुम्हारे यहाँ कोई सिस्टम नहीं है क्या? भिखारी अंदर कैसे घुस जाते हैं?”
वेटर ने अपराध-भाव से कहा,
“सर, हमें बहुत अफ़सोस है। हम खुद भी हैरान हैं। इससे पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई। हम अभी व्यवस्था करते हैं।”
वेटर गुस्से से बच्ची की ओर बढ़ा। बच्ची डर के मारे और सिमट गई। वेटर कुछ कहे, उससे पहले ही आलम साहब ने उसे रोक दिया।
फिर भारी आवाज़ में कहा,
“यह बच्ची यहाँ भीख माँगने नहीं आई है। मैंने ही इसे बुलाया है। आपको कोई आपत्ति है?”
वेटर प घलती हुई मुस्कान के साथ बोला,
“सर, हमें पता नहीं था कि आपने बुलाया है। हमें लगा कि यह अचानक अंदर आ गई है। गलतफ़हमी के लिए हमें खेद है।”
वेटर के चले जाने पर बच्ची के चेहरे से डर कुछ कम हुआ, लेकिन पूरी तरह नहीं गया। क्योंकि वह कभी ऐसे आलीशान रेस्तराँ में नहीं आई थी। और वह समझ पा रही थी कि बहुत-से लोग उसे देखकर नाखुश हुए हैं।
आलम साहब ने बच्ची की ओर देखकर नरम स्वर में पूछा,
“तुमने दोपहर का खाना खाया है?”
डरी-सहमी बच्ची ने सिर हिलाकर ‘नहीं’ कहा।
आलम साहब ने सामने की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा,
“यहाँ बैठो।”
लेकिन बच्ची कुर्सी पर बैठने के बजाय धीरे-धीरे रेस्तराँ से बाहर चली गई। उसका यह व्यवहार आलम साहब समझ नहीं पाए। उन्हें बिल्कुल भी इसकी उम्मीद नहीं थी। वे हैरानी से उसे जाते हुए देखते रहे।
थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा कि बच्ची फिर से रेस्तराँ में आई, लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी। उसके साथ तीन साल का एक छोटा बच्चा था—नंगा बदन, नंगे पैर और बिना ज़िप की पैंट पहने हुए।
आलम साहब के पास आकर बच्ची ने धीरे से कहा,
“मेरा छोटा भाई।”
छोटी-सी बच्ची के भाई के प्रति प्रेम को देखकर आलम साहब मंत्रमुग्ध हो गए। वह भाई को छोड़कर अकेले नहीं खाएगी—यह सोचकर उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने खुद को संभाला।
दोनों भाई-बहन की ओर देखकर उन्होंने कहा,
“तुम लोग बैठो।”
वे आलम साहब की मेज़ के सामने रखी कुर्सियों पर बैठ गए। डर भरी आँखों से इधर-उधर देख रहे थे।
आलम साहब ने पूछा,
“क्या खाओगे?”
बच्ची ने झिझकते हुए आलम साहब की थाली की ओर इशारा किया—यानी जो वे खा रहे हैं, वही वे भी खाएँगे।
आलम साहब ने वेटर को बुलाकर दोनों के लिए वही खाना लाने को कहा।
थोड़ी देर बाद खाना आया और तीनों एक साथ खाने लगे।
वे खाते हुए तिरछी नज़र से दोनों भाई-बहन को देख रहे थे। छोटा भाई अपने हाथ से ठीक से नहीं खा पा रहा था, इसलिए बच्ची अपने हाथों से उसे खिला रही थी। वह एक कौर खुद खाती, दूसरा कौर भाई के मुँह में डालती। यह दृश्य देखकर आलम साहब की आँखें फिर भर आईं। इस बार भी उन्होंने खुद को संभाल लिया।
खाना खत्म होने के बाद उन्होंने बच्ची से पूछा,
“तुम्हारे घर में कौन-कौन है?”
बच्ची ने धीमी आवाज़ में कहा,
“माँ।”
“तुम्हारे पिता?”
बच्ची ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं हैं।”
वे यह नहीं पूछे कि क्यों नहीं हैं। वे अंदाज़ा लगा सकते थे—या तो पिता मर चुके हैं, या फिर दूसरी शादी करके उन्हें छोड़ गए हैं। ऐसे ही होता है इन सड़क पर रहने वाले बच्चों के परिवारों में। माँ ही कड़ी मेहनत करके बच्चों को ज़िंदा रखती है।
उन्होंने वेटर को बुलाकर एक पैकेट में खाना बँधवाने को कहा।
फिर वह पैकेट बच्ची के हाथ में देते हुए बोले,
“यह तुम्हारी माँ के लिए।”
बच्ची ने धीरे से हाथ बढ़ाकर खाने का पैकेट ले लिया। फिर दोनों भाई-बहन धीरे-धीरे रेस्तराँ से बाहर चल पड़े।
बच्ची का एक हाथ खाने के पैकेट पर था और दूसरा हाथ छोटे भाई के कंधे पर। कितनी ममता से उसने भाई का कंधा थाम रखा था! मानो आसपास मौजूद उन लोगों के गुस्से से, जो उन्हें देखकर नाराज़ थे, वह अपने भाई को बचाना चाहती हो। आलम साहब की आँखें फिर भर आईं। इस बार भी उन्होंने खुद को संभाला।
लेकिन थोड़ी देर बाद जब बिल उनके पास आया, तो बिल देखते ही वे खुद को रोक नहीं पाए। अब तक रोके हुए आँसू झर-झर बहने लगे।
बिल पर कोई राशि नहीं लिखी थी, सिर्फ़ यह लिखा था—
“मानवता अमूल्य है। इसकी कीमत तय करने की क्षमता हमारे पास नहीं है। सर, आपको धन्यवाद।”
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