* बेटी के माता-पिता का भरण पोषण*

 * बेटी के माता-पिता का भरण पोषण*

थके हारे कदमों से मनोहर जी ने अपने घर में प्रवेश किया तो देखा पत्नी मोहिनी सामने ही चारपाई पर बैठी हुई थी। उन्हें परेशान देखकर वो बोली,

" क्या हुआ जी? कुछ निर्णय निकला?"

मनोहर जी एक पल के लिए वही खड़े रह गए। फिर धीरे-धीरे अपने कदमों को बढ़ाते हुए उनके पास आए और उनके पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए बोले,

" नहीं, कुछ भी फैसला नहीं हो पाया "



सुनकर मोहिनी जी भी उदास हो गई। फिर कुछ याद आते ही धीरे से बोली,
" आपने कुछ खाया?"

" नहीं, आज भूख नहीं लगी। तुमने खाना खाया?"

उनके इस प्रश्न से मोहिनी जी भी चुप हो गई। उन्हें चुप देखकर मनोहर जी ने पूछा,
" क्या हुआ? रजनी नहीं आई आज?"

" नहीं जी। अब वो भी ससुराल वाली हो चुकी है। सास और पति की मर्जी। भेजे तो भेजें, नहीं तो कोई जोर जबरदस्ती थोड़ी ना है। सच है, शादी के बाद बेटियों के हकदार बदल जाते हैं।‌ और फिर वो तो सगी बेटी भी नहीं है। मुंह बोली बेटी है। आखिर वो भी कितना निभाए "

" सच कह रही हूं तुम‌ आखिर ये तो ससुराल वालों का निर्णय है कि वो अपनी बहू को उसके मायके भेजें या नहीं भेजें। पर फिर भी मुंह बोली बेटी ने तो काफी फर्ज निभाया है। एक बार मुंह से उसके लिए बेटी निकला था। देखो, आज तक निभाया है उसने। भगवान उसे हमेशा खुश रखे। चलो कोई नहीं, मैं तुम्हारे लिए खिचड़ी बना देता हूं "

कहते हुए मनोहर जी अपने घुटनों पर हाथ रखते हुए खड़े हुए और रसोई में जाकर कूकर में खिचड़ी बनाने लगे। बीच-बीच में आकर मोहिनी जी से कितना क्या सामान लेना है पूछ रहे थे। ये देखकर मोहिनी जी की आंखों में आंसू आ गए। उनकी आंखों में आंसू देख कर मनोहर जी बोले,

" अरे क्या हुआ? तुम क्यों रो रही हो? "

मनोहर जी की बात सुनकर अपने पल्लू से अपने आंसुओं को पोंछती हुई मोहिनी जी बोली,
" देखो ना जी, अगर मेरा एक्सीडेंट ना हुआ होता तो आपको इतना परेशान नहीं होना पड़ता। कम से कम खाना बना कर तो खिला ही सकती थी। अब आपको घर और बाहर का अकेले ही सब कुछ करना पड़ रहा है "

उनकी बात सुनकर मनोहर जी उनके पास बैठते हुए बोले,

" क्यों चिंता करती हो? ये भी एक परीक्षा का वक्त है, निकल जाएगा। बस तुम हिम्मत बनाए रखो। तुम्हारा हंसता मुस्कुराता चेहरा मुझे बहुत हिम्मत देता है। क्या फर्क पड़ता है कि आज सगी बेटी ही साथ नहीं है तो "

कहते-कहते मनोहर जी उदास हो गए।

" इसी बात का तो दुख है कि अपने ही बेटी आज ये पूछ रही हैं कि आपने अपनी जिंदगी में किया क्या है? जिस बेटी को सिर आंखों पर बिठाया आज वही... "

कहती रहती मोहिनी जी भी चुप हो गई। आखिर करती भी क्या हमेशा दोनों पति-पत्नी अपनी ही बेटी की बात पर आते ही चुप हो जाते।

मोहिनी जी और मनोहर जी का छोटा सा मध्यम वर्गीय परिवार था। दो जुड़वा बच्चे बेटा अजय और बेटी सुनंदा। अपने दोनों बच्चों के साथ मनोहर जी अपने माता-पिता द्वारा बनाए गए बड़े से घर में रहते थे। लेकिन जब अजय दो साल का था, तब ऐसा बीमार हुआ कि उसे बचाया न जा सका। भगवान ने बेटा तो दिया, लेकिन उसे जिंदगी ना दी। शायद यही किस्मत है। ये सोचकर मोहिनी जी और मनोहर जी ने अपना सारा लाड़ प्यार अपनी बेटी सुनंदा को ही दिया।

सुनंदा पढ़ने में अच्छी थी। उसकी पढ़ाई लिखाई और शिक्षा पर कभी भी मनोहर जी और मोहिनी जी ने कोई कमी नहीं रखी। अपनी बेटी को ही हमेशा सर्वोपरि रखा। इस कारण वो थोड़ी जिद्दी भी थी। उसके ख्वाब कभी छोटे नहीं रहे। जब उसने अपनी स्कूली शिक्षा अच्छे नंबरों से पूरी की, तो उसने हायर स्टडीज के लिए विदेश जाने की जिद की।
अब मनोहर जी तो मामूली से क्लर्क थे। वो कहां से इतना पैसा लाते हैं। इसलिए दोनों पति-पत्नी ने बेटी की खुशी के लिए अपना मकान बेचने की फैसला लिया और मकान बेचकर खुद तीन कमरे के इस मकान में आ गए। पर बेटी को पढ़ने के लिए विदेश जरूर भेजा।
बेटी के विदेश जाने के बाद ही यहां पड़ोस में रहने वाली रचना से उनकी मुलाकात हुई। बातों बातों में एक दिन उनके मुंह से निकल ही गया कि रचना तुम तो हमारी बेटी जैसी हो। बस तब से रचना ने अपने आपको उनकी बेटी मान लिया। और अक्सर उनके पास आ जाया करती।
विदेश से पढ़ लिखकर जब वो वापस आई तो उसे अच्छा खासा पैकेज मिला। एक कंपनी में उसने नौकरी ज्वाइन कर ली। ‌लेकिन उसे ये घर छोटा लगने लगा और अपने माता-पिता पिछड़े हुए। वो कई बार अपने माता-पिता के रहन-सहन को लेकर टोकने लगी थी। कंपनी से शाम को घर आती तो सीधा अपने कमरे में घुस जाती। ज्यादा बात नहीं करती।
रचना की शादी के समय भी मनोहर जी ने सुनंदा से काफी कहा था,
" चल बेटा, रचना की शादी है। बड़े प्यार से उस बच्ची ने हमें बुलाया है। वो भी तो हमारी बेटी ही है। तुम्हारी बड़ी बहन जैसी ही है"
" आप ही जाइए ऐसी लो क्लास शादी में "
कहकर सुनंदा कमरे में चली गई। पर वो शादी में नहीं गई।
कंपनी में जॉब करते समय ही उसकी मुलाकात हितेश से हुई। दोनों ही एक दूसरे को पसंद करने लगे। वो कभी भी हितेश को अपने घर लेकर नहीं आती थी। उसे अपने घर लाते उसे शर्म महसूस होती थी। उसे लगता था कि कहीं हितेश को ये ना लगे कि उसके माता-पिता इतने पिछड़े हुए हैं और वो ऐसे छोटे से घर में रहती है।
और एक दिन बिना अपने माता-पिता को बतायें उसने हितेश से कोर्ट मैरिज कर ली। जब मनोहर जी को पता चला तो उन्हें बड़ा दुख हुआ। आखिर सुनंदा उनसे पूछती तो वो मना तो नहीं करते। जब बचपन से बेटी की जिद पूरी की है तो अब भला वो ना क्यों करते। पर बेटी के इस कदम ने उनका दिल तोड़ कर रख दिया।
लेकिन मोहिनी जी के कहने पर वो सुनंदा से मिलने उसके घर गए। अब पहली बार उसके घर गए थे तो साथ में मिठाइयां और फल भी लेकर ही गए थे। अपने माता-पिता को अचानक वहां देखकर पहले तो वो सकपका गई। पर फिर उनकी बेइज्जती करते हुए बोली,
" आप क्या लेने आए हो यहां पर? क्यों मेरी इंसल्ट करने में तुले हुए हो। आपको समझ नहीं आता कि मुझे आप लोगों को देखकर शर्म महसूस होती है। आप लोगों का कोई लिविंग स्टैंडर्ड नहीं है। अच्छा हुआ मेरे सास ससुर यहां नहीं रहते। नहीं तो जिंदगी भर के लिए ताने पड़ते मुझे। आज तो आ गए हो आप आइंदा मत आइएगा। प्लीज मुझे शर्मिंदा करना बंद करो "
कहकर सुनंदा ने हाथ जोड़ दिए। उसकी बात सुनकर मोहिनी जी की आंखों में आंसू आ गए। मनोहर जी अपनी पत्नी को रोता हुआ देखना नहीं चाहते थे। इसलिए वो उन्हें लेकर वापस जाने लगे। तो सुनंदा बोली,
" और अपने लाए हुए ये लो क्वालिटी के सामान को यहां से लेकर जाइए। हम लोग इस तरह की चीजें नहीं खाते "
ये सुनकर मनोहर जी ने कहा,
" आज तुम्हें जो सामान लो क्वालिटी का लग रहा है ना बेटा उसी को खाकर तू बड़ी हुई है। आज जिन मां-बाप को देखकर तुझे शर्म हो रही है ना, उन्ही मां-बाप ने तुझे जन्म दिया है, पाल पोसकर इतना बड़ा किया है‌। और इस लायक बनाया कि तू यहां खड़ी हुई है। इंसान को अपने दिन नहीं भूलने चाहिए। पर तुझे क्या कहूं शायद हमारे ही संस्कारों में कमी रह गई "
कहकर मनोहर जी मोहिनी जी का हाथ पकड़ कर वहां से निकल गए।
इस बात को भी आठ साल हो गए। तब से उन्होंने अपनी बेटी की शक्ल भी नहीं देखी थी। अब मनोहर जी रिटायर हो गए थे। उनके पास थोड़ी बहुत बचत थी। साथ ही एक कमरा किराए पर चढ़ा दिया था। उससे जो पैसा आता था उससे वो लोग अपना भरण पोषण कर रहे थे।
लेकिन समस्या तब शुरू हुई, जब मोहिनी जी का एक्सीडेंट हुआ। उन्होंने सुनंदा को भी बुलाया लेकिन सुनंदा नहीं आई। पर रचना जो कि मुंह बोली बेटी थी, वो दौड़-दौड़ कर संभाल रही थी। अब इस बात को भी तीन महीने हो गए। मोहिनी जी पहले से ठीक तो थी लेकिन अभी भी बिस्तर से उठ नहीं पाती थी। रचना की अपनी जिम्मेदारियां थी। वो हर रोज नहीं आ सकती थी।
लेकिन अब बचत सारी खत्म हो चुकी थी। मुश्किल से ही घर-घर चल रहा था। मनोहर जी ऐसी हालत में मोहिनी जी को छोड़कर बाहर कमाने के लिए भी नहीं जा सकते थे। इसलिए आज सुनंदा के पास गए थे उससे मदद मांगने के लिए। ये सोचकर की बेटी है कुछ तो मदद करेगी। पर सुनंदा ने तो उल्टा उन्हें ही सुनाना शुरू कर दिया,
" क्या लेने आए यहां पर? जब मैं आप लोगों से मिलने नहीं आती हूं तो समझ जाया करो ना कि मुझे आप लोगों में कोई इंटरेस्ट नहीं है। क्यों मुंह उठा कर चले आए फिर यहां पर "
मनोहर जी को गुस्सा तो बहुत आया। एक बार उनका दिल रो पड़ा बोलते हुए। लेकिन फिर भी मोहिनी जी का ध्यान आते ही बोले,
" बेटा आज मोहिनी की स्थिति खराब है और उसके इलाज में ही सारा पैसा खर्च हो चुका है। तो थोड़ी बहुत अगर पैसों की मदद कर देती तो..."
लेकिन उनके पूरा बोलने से पहले ही सुनंदा चिल्ला पड़ी,
" बोलने से पहले एक बार सोचना तो चाहिए था कि आप यहां पर मुझसे पैसे लेने आए हैं। अरे लोग तो बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते। और आप मुंह उठाकर चले आए यहां पर पैसे लेने के लिए। छी, शर्म आनी चाहिए आपको "
सुनंदा ने काफी बेइज्जत करके मनोहर जी के वहां से निकाला।
खैर, उन्होंने मोहिनी जी को खाना खिलाकर दवाई देकर सुला दिया। काफी देर तक कुर्सी पर मौन बैठे सोचते रहे। काफी सोचने के बाद उन्होंने कुछ फैसला लिया। दूसरे दिन सुबह किराएदार घर पर ही था तो उससे कहा कि वो मोहिनी जी का कुछ देर ध्यान रखें और मैं एक घंटे में जरूरी काम निपटा कर आता हूं।
फिर वो जरूरी काम से निकल गए। वहां से निकलकर वो अपने दोस्त के घर गये, जो की एक वकील भी था। और अपनी पूरी स्थिति बताते हुए उससे बोले,
"क्या तुम्हारे कानून में ऐसी कोई व्यवस्था है जो हमारी मदद कर सके। बेटी के लिए हमने अपना सबकुछ खर्च कर दिया। और आज वो ही बेटी हमें कुछ समझती नहीं है। आज हम पैसे पैसे से मोहताज है, जबकि वो अच्छा खासा कमा रही है। पर वो हमें समाज की पुरानी व्यवस्था याद दिलाते हुए कहती है कि बेटी के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए। क्या तुम्हारी कानून व्यवस्था में हमारे लिए कोई कानून है जो हमें बेटी से भरण पोषण दिला सके "
दोस्त उनकी बात सुनते ही बोला,
" है, बिल्कुल है। ऐसी व्यवस्था कानूनी दे रखी है जिसमें माता-पिता अपनी बेटी से भरण पोषण ले सकते हैं। और इसमें मैं तुम्हारी मदद करूंगा"
आखिर दोस्त की मदद से मनोहर जी ने बेटी को कोर्ट की तरफ से नोटिस भेजा। जिसे देखकर वो बुरी तरह से तिलमिला गई और उसी दिन वो घर चली आई,
" क्या है ये सब? आप अपनी ही बेटी के खिलाफ नोटिस भेज रहे हैं। शर्म नहीं आती आपको। आप मुझसे भरन पोषण मांग रहे हैं। अरे लोग तो बेटी के घर का पानी नहीं पीते और आप..."
" कौन से जमाने की बात कर रही हो तुम? तुम तो हमें पिछड़ा हुआ कहती थी और खुद पिछड़ी भी बातों को मानती हो। बेटा वो पुराने जमाने की बात थी जब बेटी के घर का पानी नहीं पीते थे। पर तुम शायद भूल गई उस समय बेटी को भी इतना पढ़ाया नहीं जाता था। और ना ही बेटी को पढ़ने के लिए विदेश भेजा जाता था, वो भी अपनी संपत्ति बेचकर। बेटा भरण पोषण तो हमारा अधिकार है वो तो हम लेकर ही रहेंगे "
मनोहर जी ने दो टूक बात कहकर सुनंदा को बाहर का रास्ता दिखा दिया। आखिर कोर्ट ने भी मनोहर जी और मोहिनी जी के पक्ष में ही निर्णय सुनाया। इस दौरान मनोहर जी के दोस्त ने उनकी काफी मदद की। पर आज सुनंदा को भरण पोषण देना ही पड़ा।

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