शादी के दो साल बाद, जब शोभा गर्भवती अवस्था में ढाका से अपने घर दिनाजपुर जा रही थी…
शादी के दो साल बाद, जब शोभा गर्भवती अवस्था में ढाका से अपने घर दिनाजपुर जा रही थी…
उस समय उसके पति शहर से बाहर थे…
जिस रिश्तेदार के भाई को स्टेशन से ट्रेन में बैठा देने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह ट्रेन लेट होने के कारण इंतज़ार करने के मूड में नहीं था। इसलिए वह सारा सामान सहित शोभा को प्लेटफ़ॉर्म की बेंच पर बैठाकर चला गया…
ट्रेन को पाँच नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर आना था… उस समय शोभा सात महीने की गर्भवती थी।
सामान ज्यादा होने के कारण उसने एक कुली से बात कर ली… बहुत ही दुबला-पतला एक बूढ़ा कुली… उसकी आँखों में पेट की मजबूरी साफ़ झलक रही थी… सामान उठाने के लिए वह एक तरह की विनती भरी उत्सुकता में था…
शोभा ने पच्चीस रुपये में उसे तय कर लिया और सहारा लेकर बैठ गई… लगभग डेढ़ घंटे बाद ट्रेन आने की घोषणा हुई… लेकिन वह बूढ़ा कुली कहीं दिखाई नहीं दिया…
कोई दूसरा कुली भी खाली नज़र नहीं आ रहा था… अगर ट्रेन छूट जाती तो घर लौटना संभव नहीं था… तब रात के साढ़े बारह बज चुके थे…
शोभा का मन बुरी तरह घबराने लगा…
तभी दूर से उसी बूढ़े को दौड़ते हुए आते देखा… उसने कहा, “चिंता मत करो माँ, हम तुम्हें ट्रेन में चढ़ा देंगे…” दौड़ने की वजह से उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं…
वह झटपट सामान उठाने लगा और इशारे से अपने पीछे आने को कहा… सीढ़ियाँ चढ़कर फुटओवर ब्रिज पार करना था, क्योंकि अचानक ट्रेन का प्लेटफ़ॉर्म बदलकर अब नंबर दो पर आ रहा था…
साँस फूलने के कारण वह धीरे-धीरे चल रहा था, और शोभा भी तेज़ चलने की हालत में नहीं थी…
इसी बीच ट्रेन की सीटी बज उठी… किसी तरह भागते हुए अपनी स्लीपर कोच ढूँढ़ ली…
कोच प्लेटफ़ॉर्म के अंत के बाद इंजन के पास था। वहाँ कोई रोशनी भी नहीं थी, और चढ़ना भी बहुत मुश्किल था…
शोभा ने पीछे मुड़कर उसे आते देखा और ट्रेन में चढ़ गई… उसी समय ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी… कुली अब भी दौड़ रहा था…
हिम्मत करके उसने एक-एक करके सामान ट्रेन की पायदान के पास रख दिया… आगे पूरा अँधेरा था…
जब तक शोभा ने जल्दी-जल्दी काँपते हाथों से दस-दस के दो नोट और पाँच रुपये का एक नोट निकाला, तब तक कुली का हाथ बहुत दूर जा चुका था…
उसकी दौड़ने की रफ्तार बढ़ रही थी… लेकिन ट्रेन की रफ्तार उससे भी ज्यादा बढ़ रही थी…
बेबस होकर वह दूर जाते उस खाली हाथ को देखती रह गई… फिर उसने देखा, वह हाथ जोड़कर नमस्कार कर रहा है, मानो आशीर्वाद दे रहा हो…
उसकी गरीबी… उसकी भूख… उसकी मेहनत… उसका सहयोग… सब कुछ एक साथ शोभा की आँखों के सामने तैरने लगा…
उस घटना के बाद, बच्चे के जन्म के पश्चात, शोभा ने कई बार स्टेशन पर उस बूढ़े कुली को खोजा, लेकिन वह फिर कभी नहीं मिला…
आज वह जगह-जगह दान करती है, लेकिन आज तक कोई भी दान उस रात के उस बूढ़े कुली के मेहनती हाथों का कर्ज़ नहीं चुका सका…
★★★ सचमुच, कुछ कर्ज़ कभी चुकाए नहीं जा सकते…!!!💔💔💔💔💔
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