* जेठानी जी हमें आपके बेटे को नहीं रखना। अपना बेटा आप खुद ही संभालिए*
जेठानी जी हमें आपके बेटे को नहीं रखना। अपना बेटा आप खुद ही संभालिए
" भाभी अब आप ही संभालिए अपने बेटे को। मैं इसे नहीं संभाल सकती। मेरे पास अपने बच्चे हैं। मैं उनकी देखभाल करूंगी या इसकी करूंगी"
शोभना उस पांच साल के मोहित को उसकी मम्मी दिव्या को सौंपते हुए बोली।
" छोटी बहू ऐसा व्यवहार तो मत कर छोटे से बच्चे के साथ। जब तुम्हें जरूरत थी, तब तो तुम इसे अपना बेटा बना कर लेकर गई थी। तब तो तुम अपनी जेठानी के पांव पड़ गई थी। और आज जब खुद एक बेटे की मां बन गई तो इसे वापस छोड़ कर जा रही हो। भगवान से डर। क्या बितेगी इस छोटे से बच्चे के दिल पर "
सास सुमति जी ने कहा।
" मुझे इन सब चीजों से कोई लेना देना नहीं है अम्मा। ये भैया भाभी की संतान है तो भैया भाभी ही रखे इसे। मैं और जिम्मेदारी नहीं उठा सकता इसकी। मेरे भी बच्चे हैं। मुझे उनका भी देखना है। शहर में रहकर खर्चे उठाना इतना आसान नहीं होता "
अब की बार छोटा बेटा रमन बोला।
" पर भैया जी, हम भी तो शहर में ही रह रहे हैं। ये तो गलत बात है ना। जब इसका जन्म हुआ था तब तो आप इसे अपना बेटा बना कर ले गए थे। और अब इसे वापस मेरे पास छोड़कर जा रहे हो। मैं क्या जवाब दूंगी अपने बाकी के तीनों बच्चों को कि चाचा चाची अपने बेटे को यहां क्यों छोड़ कर गए हैं "
अब की बार भाभी दिव्या बोली।
" अब इसमें जवाब क्या देना है भाभी? साफ-साफ बोलो कि ये आपका बेटा है। इसे आपने जन्म दिया है तो ये उनका छोटा भाई है। इसमें भला डरने की क्या बात है? डंके की चोट पर बताओ। उन्हें भी और इसे भी"
रमन ने कहा।
" अरे! कितना गलत कर रहे हो तुम लोग। ये छोटा सा बच्चा तुम्हें अपना मम्मी पापा मान चुका है और अपने मम्मी पापा को ताऊ ताई। अब तुम इसे यहां छोड़ कर जाओगे तो उसके छोटे से बाल मन पर कितना असर होगा। कुछ सोचा भी है या अपने स्वार्थ में कुछ दिख ही नहीं रहा तुमको "
सुमति जी डांटते हुए बोली।
" अम्मा अब तुम चाहे कितना भी चीखों, चिल्लाओ। मेरी क्षमता नहीं है कि मैं इसे पालूं। जब इसके मां-बाप है तो भला मुझे क्या लेना देना। हमने कोई इसका जिंदगी भर का ठेका ले रखा है क्या। मेरी भी ठीक-ठाक नौकरी ही है। अपने बच्चों को खुद संभालो। हमारा भी परिवार है। "
रमन बेशर्मी पर उतारू हो गया। ये देखकर अब तक चुप बैठे बड़े भाई राजेन्द्र ने कहा,
" तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है छोटे। मोहित मेरा बेटा है तो मैं उसे पाल लुंगा। भगवान की कृपा से अभी उसके पापा के हाथ पैर चलते हैं। भगवान ने मुझे संतान दी है तो उन्हें पालने की हिम्मत भी दी है। तुम यहां से अपने परिवार को लेकर जा सकते हो "
आखिर जब राजेंद्र ने कह दिया तो रमन अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ अपने घर रवाना होने लगा। लेकिन ये क्या? जैसे ही वो रवाना होने लगा, मोहित रोता हुआ रमन से जाकर लिपट गया,
" पापा मैं भी आपके साथ जाऊंगा। मुझे छोड़कर मत जाओ"
लेकिन रमन तो इतना कठोर दिल निकला कि उस छोटे से मोहित को एक तरफ धकेल कर अपनी दो साल की बेटी को गोद में लेकर वहां से बाहर रवाना हो गया। जब शोभना अपने पांच महीने के बेटे को लेकर बाहर रवाना होने लगी तो मोहित उससे जाकर लिपट गया और रोते हुए बोला,
" मम्मी मैं भी चलूंगा। मम्मी मैं भी चलूंगा "
शोभना उसे अपने से छुड़ाने की कोशिश करने लगी। ये देखकर सब की आंखों में आंसू आ गए। पर शोभना चिढ़ते हुए दिव्या से बोली,
" भाभी संभालो अपने बेटे को। दिख नहीं रहा आपको कि मेरी गोद में बच्चा है। कहीं आपका बेटा मेरे बेटे को ना गिरा दे "
ये सुनकर दिव्या मोहित के पास आई और उसे जबरदस्ती शोभना से छुड़ाते हुए अपनी गोद में ले लिया।
" ताई जी मुझे जाने दो। ताई जी मुझे मेरी मम्मी के साथ जाने दो "
मोहित जोर-जोर से रोता जाए और दिव्या से गुहार करते जाए। ये देखकर भी शोभना बिल्कुल नहीं रुकी और अपने बेटे को लेकर वहां से रवाना हो गई। पर उस बच्चे का चीखना चिल्लाना बदस्तूर जारी रहा।
" वो नहीं है तेरी मम्मी। मैं हूं तेरी मम्मी। सुना ना तुमने क्या कह रही थी वो "
दिव्या रोते हुए मोहित से बोली।
" बहु ये बच्चा है। उसे समझ में नहीं आएगा "
सुमति जी बोली तो दिव्या उसे जैसे-जैसे चुप करने लगी। काफी देर तक हर कोई से मनाने की कोशिश करता रहा। ये तो दिव्या की तेरह साल की बेटी टीना समझदार थी जो इन हालात को समझ रही थी। वो जैसे तैसे मोहित को अपने साथ बहला फुसलाकर ले गई।
ये सब देखकर रोती हुई अम्मा ने राजेंद्र की तरफ देखा तो राजेंद्र बोला,
" अम्मा तुम कोई बात दिल पर मत लेना। धीरे-धीरे हम मोहित और अपने बच्चों को संभाल लेंगे। और फिर टीना का भी तो साथ है। वो अपने बाकी भाई बहनों को अच्छे से संभाल लेगी। बस आप तो थोड़ा मोहित का खासकर ध्यान रखना। उसके बाल मन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है"
फिर वो दिव्या से बोला,
" दिव्या जाओ। आज मोहित की पसंद का कुछ अच्छा सा बना लो। अभी तो उसे इन्ही सब बातों से बहलाना पड़ेगा। थोड़ा टाइम लगेगा लेकिन समझ जाएगा"
राजेंद्र की बात मानकर दिव्या रसोई में चली गई।
शोभना और नमन की शादी को चार साल हो गए थे, लेकिन दोनों की कोई संतान नहीं थी। घर में हालांकि उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था, लेकिन अड़ोस पड़ोस के लोग, आने जाने वाले लोग तो टोक ही देते थे। इसलिए रमन और शोभना परेशान रहते थे।
सारे मेडिकल टेस्ट भी करवा लिए, लेकिन कोई कमी भी नहीं थी। सुमति जी ने कोई पूजा, कोई मंदिर नहीं छोड़ा कि छोटी बहू के भी बच्चा हो जाए। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। राजेंद्र और दिव्या के तब तीन बच्चे थे।
उन्हीं दिनों दिव्या दोबारा प्रेग्नेंट हो गई, पर इस बार वो बच्चा नहीं चाहती थी। क्योंकि पहले से ही तीन बच्चे थे। ऊपर से राजेंद्र का काम भी ठीक-ठाक ही चलता था। इतनी महंगाई के दौर में बच्चे को दुनिया में लाना आसान है, लेकिन पालना बहुत मुश्किल। उसने ठान लिया कि वो अबॉर्शन करा लेगी।
इस बारे में उसने सुमति जी से कहा तो सुमति जी भी राजी हो गई। लेकिन जब शोभना और नमन को पता चला तो दोनों दिव्या के पैरों में पड़ गए,
" भाभी आप अबॉर्शन मत करवाओ। ये बच्चा हमें दे दो। क्या पता भगवान ने आपके जरिए हमें हमारा बच्चा देने की ठानी हो। कम से कम आपके इस बच्चे के जरिए हम भी माता-पिता कहलाएंगे"
ये सुनकर सुमति जी भी उनकी हां में हां मिलाने लगी। लेकिन दिव्या को समझ में नहीं आया कि वो क्या करें। पर फिर भी उसने कहा,
" देखो शोभना, बात को समझो। तुम में कोई कमी नहीं है। आज नहीं तो कल तुम माता-पिता बन ही जाओगे। फिर अपनी संतान होने के बाद तुम उसके साथ परायों जैसा व्यवहार करो, ये सही नहीं होगा। उस बच्चे के मन पर गलत असर पड़ेगा। जब तुम खुद माता-पिता बन जाओगे तो फिर क्यों बच्चा गोद लेना"
लेकिन दोनों ही नहीं माने। और उनके साथ-साथ सुमति जी भी अड़ गई।
" अरे ऐसा कुछ नहीं होगा बड़ी बहु। मेरी जुबान है ये। बहु तु तो वैसे भी उसे खत्म करने जा रही है। तो सोच तेरे कारण किसी की गोद भर जाएगी। ये बच्चा अपनी किस्मत लेकर आया है। इसकी किस्मत में खूब ठाठ-बाट है। और ये जो तेरा डर है ना भविष्य को लेकर। ऐसा कुछ भी नहीं होगा। अपनी सास पर विश्वास कर"
आखिर सबके इतना कहने पर राजेंद्र ने भी दिव्या को समझाया तो दिव्या मान गई। नौ महीने बाद दिव्या ने मोहित को जन्म दिया और उसके साथ ही रमन और शोभना उसके माता-पिता बन गए। दोनों उसका अच्छे से ख्याल भी रखते थे। शोभना भी अब खुश रहने लगी थी। और ये खुशी तब दुगनी हो गई जब तीन साल बाद वो एक बेटी की मां बन गई। तब वो कहती थी कि मेरा परिवार पूरा हो गया।
पर असल समस्या तो तब शुरू हुई जब शोभना दूसरी बार प्रेग्नेंट हुई और उसने बेटे को जन्म दिया। अब खुद का बेटा हो जाने के बाद रमन और शोभना को मोहित बिल्कुल नहीं सुहाता था। उन्हें लगता था कि वो तो अपने भाई भाभी के बच्चे को संभाल रहे हैं।
उन्होने तो जैसे मोहित को भुला ही दिया। बात बात पर उसे झिड़क देना, उसका ध्यान ना रखना, कहीं जाना हो तो उसे राजेंद्र और दिव्या के पास यहां छोड़ जाना, उनकी आदत हो गई थी। दोनों मन ही मन चाहते थे कि राजेंद्र और दिव्या अपने बच्चों को वापस अपने पास रख ले और उन्हें मोहित से छुटकारा मिले। पर क्योंकि बच्चे के लिए वो दोनो खुद ही दिव्या के पीछे पड़े थे इसलिए बोल नहीं पा रहे थे।
सुमति जी, राजेंद्र और दिव्या को सब समझ में आ रहा था लेकिन वो कुछ बोल नहीं रहे थे। उन्हें तो यही लगता था कि शायद ये उनकी गलतफहमी हो। छोटे बच्चों के साथ वो उसे संभाल नहीं पा रहे हो। पर साथ ही वो अपनी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार तो नहीं कर रहे थे।
पर आज जब सुमति जी ने उन दोनों को इस बारे मे टोका तो इतनी सब बहसबाजी हो गई। आज उन्होंने अपने मन की बात कह दी और मोहित को फाइनली उसके माता-पिता के पास छोड़ ही दिया।
खैर, राजेंद्र और दिव्या उसके माता-पिता थे। अपने बच्चों को वो यूं तो नहीं छोड़ सकते थे। शुरू शुरू में तो मोहित और परिवार वालों को काफी परेशानी हुई। उस छोटे से बच्चे का मन ये मानने को तैयार ही नहीं था कि जिनके साथ वो शुरू से रहा, वो उसके माता-पिता नहीं बल्कि चाचा चाचा थे।
मोहित को इस तरह परेशान देखकर सुमति जी की आंखों में भी आंसू आ जाते। आखिर अब किस मुंह से जबान दे, जब छोटे बेटे बहु ने मान ही नहीं रखा। लेकिन फिर भी दिव्या और राजेंद्र ने कभी उनसे शिकायत नहीं की।
आखिर कुछ दिन या यूं कहे कि कुछ महिनें लगे, लेकिन मोहित धीरे-धीरे संभल गया। राजेंद्र और दिव्या उसके माता-पिता है, इस सच्चाई को उसने मान भी लिया। अपने भाई बहनों के साथ वो अब खुश रहता था। पर अब वो रमन और शोभना के सामने आना भी नहीं चाहता था। अब उन लोगों का राजेंद्र और दिव्या से व्यवहार भी पहले जैसा नहीं था।
लेकिन समय का चक्र देखो, अब राजेंद्र का व्यवसाय काफी अच्छा चल निकला था। सारे बच्चे शहर के बड़े स्कूल में पढ़ रहे थे। घर में नौकर चाकर काम कर रहे थे।
अब कभी रमन और शोभना सुमति जी से मिलते तो सुमति जी डंके की चोट पर उनसे कहती है,
" तुम अपने दिल पर बोझ मत लो बेटा। मैंने कहा था ना कि ये बच्चा अपनी किस्मत लेकर आया है। इसकी किस्मत में ठाठ-बाट लिखे थे, जो ये लौट कर अपने माता-पिता के पास आ गया। और इसके आते ही इसके पिता का व्यवसाय चल निकला। वाकई कुछ लोग किस्मत लिख कर आते हैं "
और उनकी बात सुनकर दोनों पति-पत्नी अपना सा मुंह लेकर रह जाते।
सर्वाधिकार सुरक्षित
नोट: सत्य घटना पर आधारित

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