“ननद जी, हमेशा लेना ही नहीं… कभी देना भी सीखिए”
“ननद जी, हमेशा लेना ही नहीं… कभी देना भी सीखिए”
शाम का समय था। रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। पूजा रसोई में खड़ी चाय बना रही थी और साथ-साथ मन ही मन कुछ सोच भी रही थी। तभी ड्राइंग रूम से उसकी ननद रीमा की आवाज़ आई, “भाभी, मेरी चाय बनी या नहीं? और हाँ, आज मेरे लिए पकौड़े भी बना देना… बाहर का खाने का मन नहीं है।”
पूजा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “हाँ रीमा जी, अभी लाई।”
यह कोई पहली बार नहीं था। जब भी रीमा मायके आती, पूरे घर की जिम्मेदारी जैसे पूजा के सिर पर आ जाती। सुबह से रात तक वह रीमा की हर छोटी-बड़ी मांग पूरी करती। कभी उसे नई साड़ी चाहिए होती, कभी महंगे कॉस्मेटिक्स, कभी बाजार से कुछ खास चीज़।
सास, विमला देवी, अक्सर कहतीं, “बेटी है मेरी… मायके आती है तो थोड़ा बहुत नखरा तो करेगी ही।”
पूजा चुप रह जाती। वह जानती थी कि कुछ कहने से घर में बेवजह का माहौल खराब होगा। इसलिए वह अपनी तरफ से पूरा सम्मान देती रही।
लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि रीमा सिर्फ लेने की आदी हो चुकी है। उसे इस बात का बिल्कुल अहसास नहीं कि सामने वाला कितना कर रहा है।
एक दिन सुबह-सुबह रीमा ने फिर आवाज़ लगाई, “भाभी, जरा मेरा फोन चार्ज कर दो… और हाँ, मेरा दुपट्टा प्रेस भी कर देना। मुझे अपनी सहेली के घर जाना है।”
पूजा उस समय रसोई में नाश्ता बना रही थी। उसने काम करते-करते कहा, “रीमा जी, फोन तो आप खुद भी लगा सकती हैं चार्ज में… मैं अभी थोड़ा काम में हूँ।”
रीमा को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। वह तुरंत रसोई में आ गई और थोड़ा तेज़ स्वर में बोली, “क्या भाभी, इतनी सी बात भी नहीं कर सकतीं? मैं यहाँ मेहमान हूँ।”
पूजा ने शांत रहने की कोशिश की, लेकिन आज उसके मन में जमा हुई बातें जैसे बाहर आने को तैयार थीं।
उसने धीरे से कहा, “मेहमान हैं, इसलिए तो अब तक हर बात बिना कुछ कहे करती आई हूँ।”
रीमा ने भौंहें चढ़ाकर कहा, “मतलब?”
पूजा ने गहरी सांस ली और बोली, “मतलब यह कि जब भी आप आती हैं, सिर्फ लेने की उम्मीद रखती हैं… कभी यह नहीं सोचतीं कि देने का भी कोई रिश्ता होता है।”
रीमा को यह बात चुभ गई। वह बोली, “अच्छा! तो अब मैं बोझ लगने लगी हूँ?”
इतने में विमला देवी भी वहाँ आ गईं। उन्होंने पूछा, “क्या हो रहा है यहाँ?”
रीमा ने तुरंत शिकायत कर दी, “माँ, देखो ना भाभी कैसे बात कर रही हैं। कह रही हैं मैं सिर्फ लेने आती हूँ।”
विमला देवी ने पूजा की तरफ देखा। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि पूजा कभी इस तरह कुछ कहेगी।
लेकिन पूजा ने शांत स्वर में कहा, “माँ जी, मैंने कुछ गलत नहीं कहा। बस इतना कहा कि रिश्ते सिर्फ लेने से नहीं चलते… कभी देने से भी चलते हैं।”
घर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
पूजा आगे बोली, “जब रीमा जी आती हैं तो मैं पूरी कोशिश करती हूँ कि उन्हें कोई कमी महसूस न हो। उनके लिए खास खाना बनाती हूँ, उनकी पसंद का सामान लाती हूँ… लेकिन कभी उन्होंने यह नहीं पूछा कि भाभी, आपको कुछ चाहिए?”
रीमा चुप हो गई। शायद उसने पहली बार इस नजरिए से सोचा था।
पूजा ने आगे कहा, “रिश्ते बराबरी से चलते हैं। अगर हम सिर्फ लेते रहें और सामने वाले की भावना न समझें, तो धीरे-धीरे वह रिश्ता कमजोर हो जाता है।”
विमला देवी भी अब सोच में पड़ गई थीं। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने हमेशा बेटी का पक्ष लिया, लेकिन बहू की भावनाओं को उतना महत्व नहीं दिया।
कुछ देर बाद रीमा धीरे से बोली, “भाभी… शायद आप सही कह रही हैं। मैंने कभी इस तरह सोचा ही नहीं।”
पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं। बस आगे से इतना ध्यान रखिए कि रिश्ता सिर्फ लेने से नहीं, देने से भी मजबूत होता है।”
उस दिन के बाद रीमा के व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।
जब भी वह मायके आती, पूजा के लिए कुछ न कुछ जरूर लाती। कभी उसकी पसंद की मिठाई, कभी कोई छोटी-सी साड़ी, तो कभी बस इतना कह देती, “भाभी, आज आप बैठिए… मैं चाय बनाती हूँ।”
विमला देवी यह सब देखतीं तो उनके चेहरे पर भी संतोष की मुस्कान आ जाती।
घर का माहौल पहले से कहीं ज्यादा अच्छा हो गया था।
एक दिन रीमा चाय बनाकर लाई और पूजा के पास बैठते हुए मुस्कुराकर बोली,
“भाभी, आपने उस दिन सही कहा था… ननद को सिर्फ लेना ही नहीं, कभी देना भी सीखना चाहिए।”
पूजा ने हँसते हुए कहा, “और जब दोनों तरफ से देने की भावना हो… तभी रिश्ता सच में खूबसूरत बनता है।”
उस दिन घर में सिर्फ चाय की खुशबू ही नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास भी घुल रही ..
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