* ननद रानी शादी के बाद मायके का मोह छोड़ देना चाहिए*

 * ननद रानी शादी के बाद मायके का मोह छोड़ देना चाहिए*"अब तो यह आए दिन का ही किस्सा हो गया है आज मायके में ये प्रोग्राम है आज मायके में वो प्रोग्राम है। और बेटी भी ऐसी है कि मुंह उठाकर सीधे मायके रवाना हो जाती है। एक बार मना भी नहीं करती कि मम्मी मैं मायके नहीं आऊंगी"

सासू मां जमुना जी लगातार बड़बड़ा रही थी।
"अरे इतना भी क्या मोह रखना? बेटी ब्याह दी तो अब ससुराल की हो गई। पर फिर भी छोटे-छोटे कामों में बस बुला लेते हैं। आज चाचा के बेटे का बर्थडे है तो आज मौसा जी के घर में प्रोग्राम है। आज बुआ के यहां जाना है तो आज कुछ और। और बेटी भी ऐसी जो मुंह उठाए चली जाती है"
ननद दीक्षा भी अपनी मम्मी की हां में हां मिलाते हुए बोली, जो कि खुद अभी अपने मायके आई हुई थी।
"अरे इतनी समझदारी तो उसमें खुद में होनी चाहिए। ससुराल पहले है या मायका। ससुराल को घर नहीं सराय समझ रखा है। खाओ पियो यहां का और बिन बजा बजाओ अपने मायके की। आखिर इसके मम्मी पापा से ही बात करनी पड़ेगी"
" हां मम्मी जरुर करना। भला ये कोई बात होती है। अब तो भाभी इस घर की बहू बन चुकी है लेकिन जब देखो मायके में टिकी रहती है। अच्छा लगता है क्या बहू के होते हुए सास घर का काम कर रही है"
देवर सुजीत ने भी कहा।
" अब देखो ना मम्मी। कब से चाय पकौड़ी की तलब हो रही है। लेकिन भाभी यहां है नहीं। अब कौन बनाएगा ये सब। इसलिए मैं तो कुछ कह भी नहीं रही हूं।‌ ससुराल में तो खुद ही बनाना पड़ता है लेकिन मायके की चीजों की तो बात ही कुछ और है"
दीक्षा ने कहा।
" अरे तू क्यों अपनी इच्छा को मारती है। वो भी अपनी भाभी के पीछे। अभी तो तेरी मां बैठी है। वो तेरी इच्छा पूरी करेगी। तू क्यों फिक्र करती है। मैं अभी गरमा गरम चाय पकौड़ी बनाकर लाती हूं"
कहकर जमुना जी ने अपनी बात को विराम दिया और रसोई घर में आ गई और सबके लिए चाय पकौड़े बनाने लगी। जबकि सुजीत और दीक्षा बाहर बैठकर चाय पकौड़े का इंतजार कर रहे थे।
जमुना जी के तीन बच्चे थे गगन, दीक्षा और सुजीत। गगन बड़ा बेटा था लेकिन शादी पहले दीक्षा की की गई थी।
जमुना जी ने इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि दीक्षा की शादी लोकल में ही हो ताकि बेटी मायके आती जाती अच्छी लगे। और उनकी ये मन की इच्छा भी पूरी हो गई। दीक्षा का ससुराल भी यही लोकल था। इसलिए हर आठ दस दिन में यहां आ जाया करती थी।
दीक्षा की शादी के पांच महीने बाद गगन की शादी दामिनी से हुई थी। दामिनी एक संयुक्त परिवार की बेटी थी। मायका भी लोकल ही था। इसलिए हर छोटे-मोटे फंक्शन में उसके मायके वाले उसे बुला लेते थे। पर दामिनी अपनी सात महीने की शादी में कभी रुकने के लिए वहां नहीं गई। वो अपना काम पूरा करके ही जाती थी और दो-तीन घंटे रुक कर वापस आ जाती थी। ताकि कोई परेशानी ना हो।
लेकिन ये बात जमुना जी को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। शुरू शुरू में तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन अब तो उन्हें ये सब अखरने लगा था कि बहू आए दिन मायके चली जाती है।
अब तो जैसे ही उसके मायके से न्यौता आता उनका मुंह फूल जाता। जाने की इजाजत बड़ी मुश्किल से देती थी। और इजाजत देने से पहले ये बोलना नहीं भूलती कि अब तो शादी हो गई। क्या मायके से मोह लगाए रखी हो। बार-बार मायके जाना अच्छा लगता है क्या।
लेकिन गगन उनकी बड़बड़ाहट के बावजूद भी खुद दामिनी को उसके मायके छोड़ता हुआ ऑफिस जाता था तो ये देखकर वो ज्यादा कुछ कह नहीं पाती। आखिर बेटे के सामने क्यों बुरा बनना। वैसे भी दामिनी अपने आप ही तीन चार घंटे बाद कैब करके समय पर लौट आती थी। और अगर शाम को जाना होता था तो वो खुद ही कैब करके मायके चली जाती थी और फिर गगन उसे लौटते समय ले आता था।
खैर, अभी वो लोग बैठकर चाय पकोड़े का नाश्ता कर ही रहे थे कि इतने में दामिनी अपने मायके से आ गई। उसे उसका छोटा भाई रचित छोड़ने के लिए आया था। जो उस समय अपने किसी दोस्त के घर जा रहा था। पर क्योंकि दामिनी का ससुराल रास्ते में ही था तो वो उसे छोड़ने चला आया। उसने अंदर आते ही सबको नमस्ते किया। उसे देखकर जमुना जी ने कहा,
" आज क्या बात है तुम अपनी बहन को छोड़ने आ गए। नहीं तो हर बार तो मेरे बेटे की ड्यूटी लगती है इसे लाने ले जाने की। अब जब मायका पास में हो तो यही सब चलता रहता है"
उनकी बात सुनकर रचित झेंप गया। आखिर इस बात का क्या जवाब दे। उसने दामिनी की तरफ देखा तो इतने में सुजीत ने कहा,
" सच है भाई। मैंने तो ये तमाशे देखकर डिसाइड कर लिया है कि मैं तो शादी लोकल में करूंगा ही नहीं। बीवी बाहर से ही लाऊंगा। लोकल में बहू हो तो बहुत ही तमाशे है। मायके में अगर किसी का पेट दर्द भी हो तो वो ससुराल छोड़कर मायके पहुंच जाती है। अब देखो ना बहू के होते हुए मेरी मम्मी को ये सब काम करना पड़ रहा है"
ये सुनकर तो दामिनी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। और उसके चेहरे पर आते जाते भाव ये सब बता रहे थे। ये देखकर दीक्षा ने कहा,
" भाई छोड़ ना। क्या बात लेकर बैठ गया। सच हर किसी को नहीं पचता। अब रचित इतने दिनों बाद आया है तो चाय नाश्ता तो पूछो "
" नहीं नहीं। बस मैं तो जा रहा हूं। मैं तो दीदी को छोड़ने आया था। बस "
कह कर रचित हाथ जोड़कर वहां से बाहर आ गया। उसके पीछे-पीछे दामिनी भी बाहर आ गई। उसे देखकर रचित ने कहा,
" दीदी आपके ससुराल में कोई परेशानी है तो मैं मम्मी पापा को भेजूं"
" नहीं। पहले मैं खुद ही हैंडल करूंगी। तुम घर पर किसी से कुछ मत कहना। बेवजह वो लोग परेशान होंगे"
उसने रचित से कहा और उसे विदा कर अंदर आ गई। अभी अंदर आई ही थी कि दीक्षा ने जमुना जी से कहा,
" वाह मम्मी, आज तो अच्छा ट्रेलर दिखा दिया "
और कह कर जोर से हंस पड़ी। उसके साथ-साथ जमुना जी और सुजीत भी हंस पड़े। ये देखकर तो दामिनी के तन बदन में आग ही लग गई।
" यही चलता रहा तो आगे इसके मां-बाप को भी बुलाना पड़ेगा। आखिर डरती हूं क्या मैं किसी से। बेटियों को शादी के बाद मायके का मोह छोड़ देना चाहिए। लेकिन ये आजकल की बहूओं को समझ में कहां आता है"
जमुना जी उसे सुनाते हुए बोली।
लेकिन तब दामिनी खुद को शांत करते हुए बोली,
" ननद रानी आपको सुनाई नहीं दिया। बेटियों को शादी के बाद मायके का मोह छोड़ देना चाहिए। ये बात आपकी मम्मी खुद कह रही है। फिर भी आप यहां बेशर्मों की तरह बैठकर पकोड़े खा रही हो। आपको भी मेरी तरह कुछ समझ में नहीं आता"
उसकी बात सुनकर सब लोग सकते में आ गए।
" बहु खबरदार जो तूने मेरी बेटी को कुछ कहा तो। खुद में समझ है नहीं और अपनी ननद को निशाना बना रही है। बहन बेटियां तो मायके आती ही अच्छी लगती है "
जमुना जी अचानक खड़ी होती हुई चिल्लाई।
" अच्छा! ये आपकी बेटी है इसलिए मायके आते हुए अच्छी लगती है। तो क्या मैं किसी की बहन बेटी नहीं हूं जो मायके जाते अच्छी नहीं लगी। मेरा तो संयुक्त परिवार है इसलिए आए दिन कोई ना कोई प्रोग्राम होता है। लेकिन दीदी का तो एकल परिवार है। फिर ये क्यों हर आठ दस दिन में यहां आ जाती है"
दामिनी ने पलट कर जवाब दिया।
" हे भगवान! भाभी कैसे बेशर्मों की तरह बोल रही हो। आने दो भैया को। अब वही तुम्हें बताएंगे "
अचानक दीक्षा ने कहा।
" बेशर्म तो आपने मुझे बनाया है। मैं जब भी मायके जाती हूं तो हमेशा मम्मी जी मुझे सुनाती है। और मैं हर बार चुपचाप सुन लेती हूं। कभी पलट कर कुछ नहीं कहा। लेकिन आज तो आपने मेरे भाई को ही सुना दिया। और अब आप मेरे माता-पिता को बुलाने की बात कर रही है। बिल्कुल बुलाइए। शौक से बुलाए। लेकिन जिस दिन आप उन्हें बुलाओगे ना, उस दिन मैं दीदी के सास ससुर को भी बुलाऊंगी यहां पर। उनके सामने करना फिर ये सब बातें। आखिर उन्हें भी तो पता चले कि बहू को मायके जाना चाहिए या नहीं"
कह कर दामिनी अंदर कमरे में चली गए। पीछे तीनों बड़बड़ाते रहे। रात को जब गगन घर आया तो सब ने दामिनी के खिलाफ बहुत कुछ कहा। पर वो अच्छे से जानता था कि घर में सभी को दामिनी का मायके जाना बुरा लगता है। इसलिए उसने दामिनी का पक्ष भी सुना। और बाद में उसने साफ साफ कह दिया,
" मम्मी जब आप उकसाओगे तो वो जवाब तो देगी ही ना। जब खुद की बेटी मायके आती जाती अच्छी लगती है तो बहू क्यों नहीं"
आखिर गगन ने ये सब कह कर बात को वही खत्म कर दिया। लेकिन घर में सब इस बात से चिढ़ गए। अब सब दामिनी से कम ही बात करते थे। या यू कहे कि उससे कोई काम होता था तो गगन को ही कहते थे, पर उसे नहीं कहते थे। साथ ही उस दिन के बाद से गगन को भी जोरु का गुलाम जैसी उपाधि दे दी गई।
मौलिक व स्वरचित
✍️ लक्ष्मी कुमावत
सर्वाधिकार सुरक्षित

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