बहू के लिए खाना कौन रखता है*

 *बहू के लिए खाना कौन रखता है*

ऑफिस की मीटिंग से देर रात गए घर पहुँची संध्या का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। घड़ी में रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे। जैसे-जैसे वह घर के दरवाजे के करीब पहुँच रही थी, उसके कदम भारी होते जा रहे थे। उसे अपनी सास की तीखी आवाज़ याद आ रही थी—“घर की बहू होकर इतनी देर से आना अच्छा नहीं लगता!” दरवाज़ा धीरे से खोलकर वह अंदर दाखिल हुई तो ड्राइंग रूम से हंसी-ठहाकों की आवाज़ें आ रही थीं। घर में कुछ मेहमान आए हुए थे और सब लोग गेस्ट रूम में बैठकर खाना खा चुके थे, अब चाय और गपशप का दौर चल रहा था।


संध्या ने चुपचाप अपने सैंडल उतारे और सिर झुकाकर अंदर बढ़ी, ताकि किसी की नजर उस पर न पड़े। उसके पेट में भूख के मारे ऐंठन सी हो रही थी। सुबह से उसने ठीक से कुछ खाया भी नहीं था, और ऑफिस की मीटिंग इतनी लंबी चली कि उसे खाने का वक्त ही नहीं मिला। उसने सोचा, “पहले रसोई में जाकर कुछ खा लूं, फिर सासू मां के सामने जाऊंगी।” वह दबे पांव रसोई की ओर बढ़ी, लेकिन जैसे ही उसने अंदर झांका, उसका दिल बैठ गया। कढ़ाई खाली पड़ी थी, पतीले खाली थे और सिंक में ढेर सारे जूठे बर्तन भरे हुए थे। कहीं भी खाने का एक दाना तक नजर नहीं आ रहा था।
उसकी आँखों में एक पल के लिए नमी तैर गई। उसने खुद को संभालते हुए सोचा, “शायद किसी ने मेरे लिए खाना अलग रख दिया होगा।” उसने एक-एक डब्बा खोलकर देखा, लेकिन हर डब्बा खाली था। उसके मन में एक सवाल गूंजने लगा—“क्या इस घर में बहू के लिए कोई खाना नहीं रखता?” तभी पीछे से सास की तेज आवाज़ आई—“आ गई महारानी! अब खाना ढूंढ रही हो?” संध्या घबरा गई और तुरंत मुड़कर बोली, “मां जी, वो… ऑफिस में मीटिंग थी, इसलिए देर हो गई।”
सास ने तिरस्कार भरी नजरों से उसे देखते हुए कहा, “हमारे जमाने में बहुएं घर संभालती थीं, बाहर घूमती नहीं थीं। और अगर कभी देर हो भी जाती थी, तो घरवालों के लिए पहले सोचती थीं, अपने लिए नहीं।” यह सुनकर संध्या का गला भर आया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी कि इस वक्त जवाब देने से बात और बिगड़ जाएगी। उसने धीमे स्वर में कहा, “मां जी, मेरे लिए थोड़ा सा खाना…?” सास ने बीच में ही काटते हुए कहा, “सब लोग खा चुके हैं। अगर तुम्हें इतनी ही चिंता थी खाने की, तो टाइम पर आ जाती।”
इतना कहकर सास वापस गेस्ट रूम में चली गईं, जहां हंसी-ठहाकों का दौर फिर से शुरू हो गया। संध्या वहीं रसोई में खड़ी रह गई, जैसे उसके पैरों में जान ही न हो। उसने धीरे से फ्रिज खोला—शायद उसमें कुछ मिल जाए। लेकिन फ्रिज में भी बस कुछ कटी सब्जियां और खाली बर्तन रखे थे। उसने गहरी सांस ली और नल के नीचे हाथ धोकर एक गिलास पानी पी लिया। पेट की आग थोड़ी देर के लिए शांत हुई, लेकिन दिल में जो खालीपन था, वो और गहरा हो गया।
उसी वक्त उसके पति, रोहन, रसोई में आए। उन्होंने संध्या को उदास खड़े देखा तो पूछा, “अरे, तुम आ गई? खाना खा लिया?” संध्या ने हल्की सी मुस्कान लाने की कोशिश की और बोली, “नहीं, बस अभी देख रही थी…” रोहन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और समझ गए कि खाना खत्म हो चुका है। उन्होंने थोड़ा असहज होकर कहा, “तुमने मुझे पहले बता दिया होता, तो मैं तुम्हारे लिए कुछ रखवा देता।” संध्या के मन में दर्द की एक लहर उठी—“क्या मुझे हर बार खुद के लिए कहना पड़ेगा?”
उसने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया। रोहन ने कहा, “चलो, मैं बाहर से कुछ ऑर्डर कर देता हूं।” लेकिन संध्या ने तुरंत मना कर दिया—“नहीं, रहने दीजिए। अब भूख भी नहीं है।” उसकी आवाज़ में जो टूटन थी, वो साफ झलक रही थी। रोहन समझ तो रहे थे कि संध्या को बुरा लगा है, लेकिन उन्होंने बात को वहीं खत्म करना ही बेहतर समझा और वापस गेस्ट रूम में चले गए।
उस रात संध्या अपने कमरे में चुपचाप लेटी रही। उसके पेट में भूख और दिल में तकलीफ दोनों एक साथ मचल रहे थे। उसे अपने मायके की याद आ गई, जहां उसकी मां हमेशा उसके लिए खाना बचाकर रखती थीं, चाहे वह कितनी भी देर से क्यों न आए। वहां किसी को ये पूछने की जरूरत नहीं पड़ती थी कि “खाना रखा है या नहीं”, क्योंकि वहां प्यार अपने आप हर जरूरत का ख्याल रखता था।
अगली सुबह संध्या ने एक फैसला किया। उसने सोचा कि अगर इस घर में उसकी जरूरतों को कोई नहीं समझता, तो उसे खुद ही अपनी अहमियत समझानी होगी। उसने रोज की तरह सुबह जल्दी उठकर सारे काम निपटाए, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर एक अलग ही सख्ती थी। जब दोपहर में सास ने कहा, “बहू, आज मेहमान फिर आएंगे, खाना अच्छा बनाना,” तो संध्या ने शांत लेकिन ठोस आवाज़ में कहा, “मां जी, आज मैं ऑफिस से समय पर नहीं आ पाऊंगी, इसलिए आप खाना बनवा लीजिए… और हां, अगर मैं देर से आऊं, तो मेरे लिए खाना जरूर रख दीजिएगा।”
सास को उसकी बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। शाम को जब वही स्थिति दोबारा बनी और संध्या देर से घर लौटी, तो उसने देखा कि इस बार रसोई में एक थाली ढकी हुई रखी थी। वह कुछ पल के लिए वहीं खड़ी रह गई। धीरे से उसने ढक्कन उठाया—गरम-गरम रोटियां और सब्जी उसकी इंतजार में रखी थी।
उसकी आंखों में आंसू आ गए, लेकिन इस बार ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि अपने हक को पाने की खुशी के थे। उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी चुप रहकर सहने से बेहतर होता है, अपनी बात सही समय पर सही तरीके से कहना। क्योंकि सवाल सिर्फ खाने का नहीं था… सवाल था उसकी अहमियत का, उसके होने के सम्मान का।
और उस दिन के बाद, इस घर में एक बात हमेशा याद रखी जाने लगी—“बहू के लिए भी खाना रखा जाता है।”दोस्तो आगर आपको ये कहानी अच्छी लगी हो तो कमेंट में राधे राधे ज़रूर लिखें और लाइक शेयर🙏🙏

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