हर महीने पत्नी की देखभाल के लिए पैसे देने वाला पति घर जल्दी लौटा, तो उसे रसोई में सड़ा खाना खाते देख सुनना पड़ा—“मुझे यही खाने को मिलता है”, और उसी पल उसका संसार बिखर गया
और उसी क्षण बाहर मुख्य दरवाज़े की कुंडी तेज़ी से खनकी।
मालती देवी अंदर आईं। हाथ में बाज़ार की थैली थी, चेहरे पर वही आत्मविश्वास जो हमेशा रहता था। लेकिन रसोई की दहलीज़ पर खड़े अर्णव को देखते ही उनके पाँव एक पल के लिए ठिठके।
"अरे, तू इतनी जल्दी?" उन्होंने सहज आवाज़ में कहा, "दफ़्तर में छुट्टी थी क्या?"
अर्णव ने उत्तर नहीं दिया। उसके हाथ में वह कटोरा अभी भी था।
मालती देवी की नज़र उस कटोरे पर पड़ी। एक पल के लिए उनकी आँखें सिकुड़ीं, फिर वे सामान्य हो गईं।
"अरे वो तो मैंने रात का बचा हुआ खाना रख दिया था, फेंकना ठीक नहीं लगता—"
"माँ।"
अर्णव की आवाज़ में कोई क्रोध नहीं था। कोई चीख़ नहीं। बस एक ऐसी थकान थी जो हड्डियों तक उतर जाती है।
"मैं हर महीने डेढ़ लाख रुपये देता हूँ।"
"हाँ तो, घर का खर्च होता है, दवाइयाँ होती हैं, दूध—"
"मधुमिता को दूध कब मिला आखिरी बार?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मालती देवी ने थैली मेज़ पर रखी। उनकी आँखें एक पल को इधर-उधर घूमीं। "वो नहीं पीती, उसे पसंद नहीं—"
"माँ।"
मधुमिता सिर झुकाए बैठी थी। उसने एक शब्द नहीं कहा। उसे कहने की ज़रूरत नहीं थी। उसका पीला चेहरा, उसकी काँपती उँगलियाँ, उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे — सब कुछ खुद बोल रहे थे।
अर्णव ने धीरे से कटोरा किचन की स्लैब पर रखा। फिर वह मधुमिता के पास फर्श पर बैठ गया। उसने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में लिया। मधुमिता ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा।
"कितने दिन से?" उसने पूछा।
मधुमिता के होंठ काँपे। "जब से… जब से घर आई हूँ।"
"बच्चा?"
"वो…" मधुमिता की आवाज़ टूट गई, "वो ऊपर सो रहा है। उसे माँजी ने अपने कमरे में रख लिया है। मुझे रात को भी उसके पास—"
वह आगे नहीं बोल सकी।
अर्णव ने आँखें मूँद लीं। उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं। पर उसने अपनी आवाज़ को काबू में रखा।
वह उठा। उसने फ्रिज खोला। जो कुछ भी अंदर था — महँगे अचार के मर्तबान, मिठाइयाँ, अच्छे फल — सब मालती देवी के लिए थे, यह उसे अब समझ आ रहा था।
उसने बाहर से लाए थैले में से दूध, फल और बादाम निकाले। चूल्हा जलाया।
"माँ," उसने पीठ फेरे-फेरे ही कहा, "आप अपने कमरे में जाइए।"
"क्या मतलब? मैं अपने ही घर में—"
"माँ।"
इस बार उस एक शब्द में जो कुछ था, वह मालती देवी ने समझा। वे कुछ बुदबुदाते हुए चली गईं।
अर्णव ने चुपचाप दूध गर्म किया। उसमें बादाम, थोड़ी इलायची डाली। एक थाली में केला और सेब काटे। मधुमिता देखती रही। वह हिल तक नहीं सकी।
जब अर्णव ने वह सब उसके सामने रखा और फर्श पर उसके बगल में बैठ गया, तब मधुमिता से नहीं रहा गया।
"तुम्हें… तुम्हें माँजी से बात करनी चाहिए थी। वो बुरा मान जाएँगी। घर में—"
"मधुमिता।"
"हाँ?"
"तुम खाओ।"
वह चुप हो गई। उसने काँपते हाथ से गिलास उठाया। पहला घूँट लेते ही उसकी आँखें भर आईं। वह रोई नहीं। बस आँसू चुपचाप गालों पर उतरते रहे।
अर्णव वहीं बैठा रहा। उसने कहा, "आज रात हम दोनों बाहर सोएँगे। बच्चा हमारे साथ रहेगा।"
"माँजी—"
"मेरी माँ हैं वो। उनसे मैं बात करूँगा।" उसने एक साँस ली, "लेकिन पहले तुम खाओ।"
उस रात देर से, जब मधुमिता और बच्चा कमरे में सो गए, अर्णव माँ के कमरे में गया।
मालती देवी जाग रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब भाव था — न पश्चाताप, न क्रोध। बस एक पुरानी ज़िद।
"बहुएँ नखरे करती हैं," उन्होंने पहले ही कहा, "मैं जानती हूँ इस तरह की लड़कियों को—"
"माँ," अर्णव ने धीरे से कुर्सी खींचकर उनके सामने बैठ गया, "मैं तुमसे लड़ने नहीं आया।"
मालती देवी रुक गईं।
"मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ।" उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, "जब मैं छोटा था, बीमार पड़ता था — तुम रात भर जागती थीं ना? मुझे याद है।"
माँ की आँखें एक पल को नरम हुईं। "हाँ तो। माँ होती हूँ।"
"वैसी ही माँ अब मधुमिता है। मेरे बेटे की माँ।" उसने रुककर कहा, "और जो तुमने उसके साथ किया — वो मेरे बेटे के साथ भी किया। उसकी माँ को कमज़ोर करके, तुमने उसे कमज़ोर किया।"
मालती देवी का मुँह खुला, फिर बंद हो गया।
"मैं तुम्हें घर से नहीं निकाल रहा। तुम मेरी माँ हो।" अर्णव उठा, "लेकिन कल से घर में जो खाना बनेगा, वो एक थाली का होगा। सबके लिए बराबर।"
अगले दिन सुबह जब मधुमिता उठी, तो बेड के पास एक गिलास गर्म दूध रखा था। उसके बगल में एक छोटी-सी चिट —
"डॉक्टर ने कहा था, अच्छा खाओ। माफ़ करो, देर हो गई।"
मधुमिता ने चिट को मुट्ठी में बंद किया। बच्चे की तरफ़ देखा। उसके गाल गुलाबी थे, साँस गहरी थी।
पहली बार 32 दिनों में उसे लगा — शायद सब ठीक हो जाएगा।
कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, एक कटोरे में परोसे गए खाने से टूटते हैं। और कुछ रिश्ते एक गिलास गर्म दूध से जुड़ते हैं।
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