हर महीने पत्नी की देखभाल के लिए पैसे देने वाला पति घर जल्दी लौटा, तो उसे रसोई में सड़ा खाना खाते देख सुनना पड़ा—“मुझे यही खाने को मिलता है”, और उसी पल उसका संसार बिखर गया

जिस दोपहर अर्णव ने अपनी नई माँ बनी पत्नी को रसोई के कोने में छिपकर सड़े चावल और सूखी मछली के सिर व काँटे निगलते देखा, उसी क्षण उसके भीतर कुछ ऐसा टूट गया जिसकी आवाज़ उसने पहले कभी नहीं सुनी थी।
उस दिन साल्ट लेक के दफ़्तर में अचानक बिजली चली गई थी। बड़े अधिकारी ने सबको 11 बजे ही घर भेज दिया। बाहर चिलचिलाती धूप थी, फिर भी अर्णव के मन में अजीब-सी खुशी थी। उसने सोचा, इतने दिनों बाद वह मधुमिता को सचमुच खुश कर पाएगा। डॉक्टर ने कहा था कि प्रसव के बाद उसे अच्छा खाना, गरम दूध, फल, मेवे और आराम की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। हर महीने वह 1.5 लाख रुपये अपनी माँ मालती देवी के हाथ में इसलिए देता था कि उसकी पत्नी और नवजात बेटे की देखभाल में कोई कमी न रहे।
घर लौटते समय वह गरियाहाट की एक बड़ी दुकान से महँगा दूध, ताज़े फल और बादाम लेकर आया। रास्ते भर वह मधुमिता का चेहरा सोचता रहा। पिछले 32 दिनों से वह दफ़्तर और घर के बीच पिस रहा था। बच्चे के जन्म के बाद से उसने खुद को यही समझाया था कि माँ घर पर हैं, इसलिए सब ठीक होगा। फ़ोन पर भी माँ रोज़ एक ही बात कहती थीं—बहू खूब खा रही है, आराम कर रही है, बच्चा भी तंदुरुस्त है।
लेकिन घर पहुँचते ही पहली चुभन उसे दरवाज़े से मिली। कुंडी आधी खुली थी।
अंदर असामान्य सन्नाटा पसरा था। न बच्चे के रोने की आवाज़, न बर्तनों की खनक, न माँ की ऊँची बोलती आवाज़। अर्णव ने धीरे से थैले मेज़ पर रखे और दबे पाँव रसोई की तरफ़ बढ़ा। वह सोच रहा था शायद मधुमिता सो रही होगी, या माँ पड़ोस की किसी महिला से बतिया रही होंगी।
रसोई के दरवाज़े पर पहुँचकर वह जम गया।
मधुमिता चूल्हे के पास फर्श पर बैठी थी। उसका पीला, थका चेहरा पसीने और आँसुओं से भीगा हुआ था। बाल बेतरतीब बँधे थे। दोनों हाथों से वह एक बड़ा कटोरा पकड़े थी और जल्दी-जल्दी उसमें से कुछ खा रही थी, जैसे कोई उसे देख लेगा तो वह निवाला भी छिन जाएगा। बीच-बीच में वह दरवाज़े की तरफ़ घबराकर देख लेती, फिर काँपते हाथ से आँखें पोंछती और खाती जाती।
अर्णव का माथा सिकुड़ गया। उसने तीखी आवाज़ में पूछा, “मधुमिता, तुम छिपकर क्या खा रही हो?”
मधुमिता ऐसी काँपी कि चम्मच हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया। उसने अर्णव को देखा तो चेहरा बिल्कुल सफ़ेद पड़ गया। घबराकर उसने कटोरा अपने सीने से चिपका लिया।
“त… तुम इस समय?” उसकी आवाज़ फँस गई, “मैं… बस खाना खा रही थी…”
अर्णव ने एक शब्द भी नहीं कहा। वह आगे बढ़ा और कटोरा उसके हाथ से खींच लिया।
अगले ही पल उसकी साँस रुक गई।
कटोरे में खाना नहीं, मानो अपमान भरा था। सूखे, बासी, हल्के पीले पड़े चावल। ऊपर से फेंके हुए सूखी मछली के सिर। तीखे काँटे। कुछ जली हुई खाल के टुकड़े। ऐसी चीज़ जिसे इंसान तो दूर, कोई किसी आवारा बिल्ली के आगे भी शर्म से रखे।
उसने धीरे से मधुमिता की तरफ़ देखा। “यह क्या है?”
मधुमिता ने होंठ भींच लिए। आँखों में आँसू भर आए, पर उसने सिर झुका लिया।
“मैं पूछ रहा हूँ, यह क्या है?”
कई क्षण बीत गए। फिर उसके सूखे होंठ काँपे।
“यही… खाना है।”
अर्णव की आँखें फैल गईं। “किसका खाना?”
मधुमिता ने उत्तर नहीं दिया। उसकी उँगलियाँ मेज़ के कोने को पकड़कर सख़्त हो गईं। फिर बहुत धीमे, लगभग शर्म से मरती हुई आवाज़ निकली—
“मैं… रोज़ यही खाती हूँ।”
और उसी क्षण बाहर मुख्य दरवाज़े की कुंडी तेज़ी से खनकी।

और उसी क्षण बाहर मुख्य दरवाज़े की कुंडी तेज़ी से खनकी।

मालती देवी अंदर आईं। हाथ में बाज़ार की थैली थी, चेहरे पर वही आत्मविश्वास जो हमेशा रहता था। लेकिन रसोई की दहलीज़ पर खड़े अर्णव को देखते ही उनके पाँव एक पल के लिए ठिठके।

"अरे, तू इतनी जल्दी?" उन्होंने सहज आवाज़ में कहा, "दफ़्तर में छुट्टी थी क्या?"

अर्णव ने उत्तर नहीं दिया। उसके हाथ में वह कटोरा अभी भी था।

मालती देवी की नज़र उस कटोरे पर पड़ी। एक पल के लिए उनकी आँखें सिकुड़ीं, फिर वे सामान्य हो गईं।

"अरे वो तो मैंने रात का बचा हुआ खाना रख दिया था, फेंकना ठीक नहीं लगता—"

"माँ।"

अर्णव की आवाज़ में कोई क्रोध नहीं था। कोई चीख़ नहीं। बस एक ऐसी थकान थी जो हड्डियों तक उतर जाती है।

"मैं हर महीने डेढ़ लाख रुपये देता हूँ।"

"हाँ तो, घर का खर्च होता है, दवाइयाँ होती हैं, दूध—"

"मधुमिता को दूध कब मिला आखिरी बार?"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मालती देवी ने थैली मेज़ पर रखी। उनकी आँखें एक पल को इधर-उधर घूमीं। "वो नहीं पीती, उसे पसंद नहीं—"

"माँ।"

मधुमिता सिर झुकाए बैठी थी। उसने एक शब्द नहीं कहा। उसे कहने की ज़रूरत नहीं थी। उसका पीला चेहरा, उसकी काँपती उँगलियाँ, उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे — सब कुछ खुद बोल रहे थे।

अर्णव ने धीरे से कटोरा किचन की स्लैब पर रखा। फिर वह मधुमिता के पास फर्श पर बैठ गया। उसने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में लिया। मधुमिता ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा।

"कितने दिन से?" उसने पूछा।

मधुमिता के होंठ काँपे। "जब से… जब से घर आई हूँ।"

"बच्चा?"

"वो…" मधुमिता की आवाज़ टूट गई, "वो ऊपर सो रहा है। उसे माँजी ने अपने कमरे में रख लिया है। मुझे रात को भी उसके पास—"

वह आगे नहीं बोल सकी।

अर्णव ने आँखें मूँद लीं। उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं। पर उसने अपनी आवाज़ को काबू में रखा।

वह उठा। उसने फ्रिज खोला। जो कुछ भी अंदर था — महँगे अचार के मर्तबान, मिठाइयाँ, अच्छे फल — सब मालती देवी के लिए थे, यह उसे अब समझ आ रहा था।

उसने बाहर से लाए थैले में से दूध, फल और बादाम निकाले। चूल्हा जलाया।

"माँ," उसने पीठ फेरे-फेरे ही कहा, "आप अपने कमरे में जाइए।"

"क्या मतलब? मैं अपने ही घर में—"

"माँ।"

इस बार उस एक शब्द में जो कुछ था, वह मालती देवी ने समझा। वे कुछ बुदबुदाते हुए चली गईं।

अर्णव ने चुपचाप दूध गर्म किया। उसमें बादाम, थोड़ी इलायची डाली। एक थाली में केला और सेब काटे। मधुमिता देखती रही। वह हिल तक नहीं सकी।

जब अर्णव ने वह सब उसके सामने रखा और फर्श पर उसके बगल में बैठ गया, तब मधुमिता से नहीं रहा गया।

"तुम्हें… तुम्हें माँजी से बात करनी चाहिए थी। वो बुरा मान जाएँगी। घर में—"

"मधुमिता।"

"हाँ?"

"तुम खाओ।"

वह चुप हो गई। उसने काँपते हाथ से गिलास उठाया। पहला घूँट लेते ही उसकी आँखें भर आईं। वह रोई नहीं। बस आँसू चुपचाप गालों पर उतरते रहे।

अर्णव वहीं बैठा रहा। उसने कहा, "आज रात हम दोनों बाहर सोएँगे। बच्चा हमारे साथ रहेगा।"

"माँजी—"

"मेरी माँ हैं वो। उनसे मैं बात करूँगा।" उसने एक साँस ली, "लेकिन पहले तुम खाओ।"


उस रात देर से, जब मधुमिता और बच्चा कमरे में सो गए, अर्णव माँ के कमरे में गया।

मालती देवी जाग रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब भाव था — न पश्चाताप, न क्रोध। बस एक पुरानी ज़िद।

"बहुएँ नखरे करती हैं," उन्होंने पहले ही कहा, "मैं जानती हूँ इस तरह की लड़कियों को—"

"माँ," अर्णव ने धीरे से कुर्सी खींचकर उनके सामने बैठ गया, "मैं तुमसे लड़ने नहीं आया।"

मालती देवी रुक गईं।

"मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ।" उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, "जब मैं छोटा था, बीमार पड़ता था — तुम रात भर जागती थीं ना? मुझे याद है।"

माँ की आँखें एक पल को नरम हुईं। "हाँ तो। माँ होती हूँ।"

"वैसी ही माँ अब मधुमिता है। मेरे बेटे की माँ।" उसने रुककर कहा, "और जो तुमने उसके साथ किया — वो मेरे बेटे के साथ भी किया। उसकी माँ को कमज़ोर करके, तुमने उसे कमज़ोर किया।"

मालती देवी का मुँह खुला, फिर बंद हो गया।

"मैं तुम्हें घर से नहीं निकाल रहा। तुम मेरी माँ हो।" अर्णव उठा, "लेकिन कल से घर में जो खाना बनेगा, वो एक थाली का होगा। सबके लिए बराबर।"


अगले दिन सुबह जब मधुमिता उठी, तो बेड के पास एक गिलास गर्म दूध रखा था। उसके बगल में एक छोटी-सी चिट —

"डॉक्टर ने कहा था, अच्छा खाओ। माफ़ करो, देर हो गई।"

मधुमिता ने चिट को मुट्ठी में बंद किया। बच्चे की तरफ़ देखा। उसके गाल गुलाबी थे, साँस गहरी थी।

पहली बार 32 दिनों में उसे लगा — शायद सब ठीक हो जाएगा।


कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, एक कटोरे में परोसे गए खाने से टूटते हैं। और कुछ रिश्ते एक गिलास गर्म दूध से जुड़ते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं

  हर महीने पत्नी की देखभाल के लिए पैसे देने वाला पति घर जल्दी लौटा, तो उसे रसोई में सड़ा खाना खाते देख सुनना पड़ा—“मुझे यही खाने को मिलता है...

Blogger द्वारा संचालित.