वकील साहब और उनका स्कूटर
एक पंडित जी वकील साहेब थे। कस्बे से कचहरी की दूरी महज़ 9 किलोमीटर थी।
एकदम वीराने में था कस्बा
कस्बे से कचहरी तक पहुंचने का साधन यदा कदा ही मिलता था, तो अक्सर लिफ्ट मांग कर ही काम चलाना पड़ता था और न मिले तो प्रभु के दिये दो पैर, भला किस दिन काम आएंगे।
"पता नही क्या सोच कर वकालत कर लिए पता नहि किसकी सलाह थी इससे भला तो चुंगी पर परचून की दुकान खोल लो।"
लिफ्ट मांगते, साधन तलाशते पंडित जी रोज यही सोचा करते।
धीरे धीरे कुछ जमापूंजी इकठ्ठा कर, उन्होंने एक स्कूटर ले लिया।
बिलकुल नया चमचमाता स्कूटर।
स्कूटर लेने के साथ ही उन्होंने एक प्रण लिया कि वो कभी किसी को लिफ्ट के लिए मना न करेंगें।।
आखिर वो जानते थे जब कोई लिफ्ट को मना करे तो कितनी शर्मिंदगी महसूस होती है।
अब पंडित जी रोज अपने चमचमाते स्कूटर से कचहरी जाते, और रोज कोई न कोई उनके साथ जाता। लौटते में भी कोई न कोई मिल ही जाता।
एक रोज लौटते वक्त एक व्यक्ति परेशान सा लिफ्ट के लिये हाथ फैलाये था, , अपनी आदत अनुसार पंडित जी ने स्कूटर रोक दिया। वह व्यक्ति पीछे बैठ गया।
थोड़ा आगे चलते ही उस व्यक्ति ने चाकू निकाल पंडित जी की पीठ पर लगा दिया।
"जितना रुपया है वो, और ये स्कूटर मेरे हवाले करो।" व्यक्ति बोला।
पंडित जी की सिट्टी पिट्टी गुम, डर के मारे स्कूटर रोक दिया। पैसे तो पास में ज्यादा थे नहीं, पर प्राणों से प्यारा, पाई पाई जोड़ कर खरीदा स्कूटर तो था।
*"एक निवेदन है,"* स्कूटर की चाभी देते हुए पंडित जी बोले ।
"क्या?" वह व्यक्ति बोला।
"यह कि तुम कभी किसी को ये मत बताना कि ये स्कूटर तुमने कहाँ से और कैसे चोरी किया, विश्वास मानो मैं भी रपट नहीं लिखउँगा।" पंडित जी बोले।
"क्यों?" व्यक्ति हैरानी से बोला।
"यह रास्ता बहुत उजड्ड है, निरा वीरान | सवारी मिलती नहीं, उस पर ऐसे हादसे सुन आदमी लिफ्ट देना भी छोड़ देगा।" पंडित जी बोले।
व्यक्ति का दिल पसीजा, उसे पंडित जी भले मानुष प्रतीत हुए, पर धंधा तो धंधा होता है। 'ठीक है कहकर' वह व्यक्ति स्कूटर ले उड़ा।
अगले दिन पंडित जी सुबह सुबह अखबार उठाने दरवाजे पर आए, दरवाजा खोला तो स्कूटर सामने खड़ा था। पंडित जी की खुशी का ठिकाना न रहा, दौड़ कर गए और अपने स्कूटर को बच्चे जैसा प्यार करने लगे, देखा तो उसमें एक कागज भी लगा था।
"पंडित जी, यह मत समझना कि आपकी बातें सुन मेरा हृदय पिघल गया।*
कल मैं आपसे स्कूटर लूट उसे ले गया, सोचा कबाड़ी वाले के पास बेच दूँ।
"अरे ये तो पंडित जी का स्कूटर है। " इससे पहले मैं कुछ कहता कबाड़ी वाला बोला......
"अरे पंडित जी ने मुझे बाजार कुछ काम से भेजा है।" कहकर मैं बाल बाल बचा। परन्तु शायद उस व्यक्ति को मुझ पर शक सा हो गया था।
फिर मैं एक हलवाई की दुकान गया, जोरदार भूख लगी थी तो कुछ सामान ले लिया। "अरे ये तो पंडित जी का स्कूटर है।" वो हलवाई भी बोल पड़ा।
"हाँ, उन्हीं के लिये तो ये सामान ले रहा हूँ, घर में कुछ मेहमान आये हुए हैं।" कहकर मैं जैसे तैसे वहां से भी बचा।
फिर मैंने सोचा कस्बे से बाहर जाकर कहीं इसे बेचता हूँ। शहर के नाके पर एक पुलिस वाले ने मुझे पकड़ लिया।
"कहाँ, जा रहे हो और ये पंडित जी वकील साहब का स्कूटर तुम्हारे पास कैसे।" वह मुझ पर गुर्राया। किसी तरह उससे भी बहाना बनाया।
"हे, पंडित जी तुम्हारा यह स्कूटर है या आमिताभ बच्चन। सब इसे पहचानते हैं। आपकी अमानत मैं आपके हवाले कर रहा हूँ, इसे बेचने की न मुझमें शक्ति बची है न हौसला। आपको जो तकलीफ हुई उस एवज में स्कूटर का टैंक फुल करा दिया है।"
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