ट्विशा ने की थी आत्महत्या, चार्जशीट दाखिल
**छूट गए राक्षस माँ-बेटे...**
त्विशा शर्मा मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज हुआ है। अब अदालत तय करेगी कि आरोप कितने सच हैं और किसकी क्या जिम्मेदारी है।
लेकिन एक बात समझने की जरूरत है।
आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा में सजा का प्रावधान है, लेकिन ऐसे मामलों में दोष साबित करना बेहद कठिन होता है। इसी वजह से कई परिवारों को न्याय की लड़ाई वर्षों तक लड़नी पड़ती है।
और शायद इसी कमजोरी का फायदा उठाकर हमारे समाज में कुछ लोग बहू को सीधे नुकसान पहुँचाने के बजाय **मानसिक प्रताड़ना को हथियार** बना लेते हैं।
इतना दबाओ, इतना तोड़ो, इतना अपमानित करो कि इंसान खुद जिंदगी खत्म करने की स्थिति में पहुँच जाए।
यानी **साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।**
बहू चली जाए और राजा बेटा हत्यारा भी न कहलाए।
अरे सिंदूर-मंगलसूत्र गैंग...
जिस रिश्ते के नाम पर इतनी हाय-तौबा मचाते हो, पहले यह साबित करो कि **उस रिश्ते में जाने वाली औरत सुरक्षित भी रहेगी।**
त्विशा ने भी उसी रिश्ते के नाम का सिंदूर और मंगलसूत्र पहना था।
आज वह इस दुनिया में नहीं है। और उसके जाने के बाद भी अगर उसके चरित्र पर सवाल उठते रहें, उसे बदनाम किया जाता रहे और उसका पति अपनी मृत पत्नी के सम्मान की रक्षा तक न कर पाए, तो सवाल सिर्फ एक परिवार पर नहीं उठता—**उस पूरी सोच पर उठता है जो शादी को औरत की सुरक्षा से ज्यादा उसकी सामाजिक पहचान बना देती है।**
औरत को प्रतीक नहीं, सुरक्षा चाहिए।
सुहाग का प्रदर्शन नहीं, सम्मान चाहिए।
शादी का तमगा नहीं, इंसान की तरह जीने का अधिकार चाहिए।
अगर यह नहीं दे सकते, तो माथे पर सिंदूर और गले में मंगलसूत्र को औरत की सुरक्षा का प्रमाण बताना बंद करो।
**ये सिर्फ त्विशा की कहानी नहीं है।**
यह उन अनगिनत लड़कियों की कहानी है जो शादी के बाद अपने ही घर में मानसिक प्रताड़ना सहती हैं, मदद के लिए आवाज उठाती हैं और फिर भी उनकी बात को अक्सर यह कहकर टाल दिया जाता है—
**“घर की बात है, सह लो।”**
यही सोच बदलनी है।
क्योंकि किसी औरत की जिंदगी खत्म हो जाने के बाद उसके लिए न्याय माँगना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि अ
गली त्विशा को न्याय की जरूरत ही न पड़े।
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