अक्सर तोहफे देने वाली बहू दूसरी बहू पर भारी पड़ जाती है*
बाहर वाले कमरे में रमा जी और उनकी सहेलियों की अच्छी खासी महफिल जमी हुई थी। अचानक बहूओं की बात शुरू हुई तो रमा जी बोली,
" मेरी बड़ी बहु ज्यादा अच्छी है। मेरा कितना ध्यान रखती है। मुझे किसी भी चीज की जरूरत होती है तो बिना बोले ही लाकर दे देती है। पर आज तक छोटी बहू ने तो मुझे कुछ भी लाकर नहीं दिया"
रमा जी अपनी बड़ी बहू सुरेखा की तारीफ करते हुए बोली।
रसोई घर में काम कर रही छोटी बहू रागिनी के कानों में भी ये सब शब्द जा रहे थे। पहले तो फिर भी उसे सुनकर बुरा लगता था। पर अब तो शायद वो इन सब चीजों की आदी हो चुकी थी। इसलिए निरंतर अपना काम किये जा रही थी। जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
पता था चाहे उसमें लाख बुराई ही क्यों ना हो, काम तो उसे ही करना है। और नाश्ता बनाकर उसे ही परोसना है। वो भी उन लोगों के लिए जो बाहर बैठकर उसकी बुराई पुराण बोल भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं। और फिर सबसे बड़ी बात ये भी तो थी कि अधिकतर खरीददारी सुरेखा भाभी ही तो करती थी। वो तो घर में रहकर घर का काम संभालती थी।
जब भी शॉपिंग की कोई बात आती थी दोनों सास बहू अकेले चली जाती थी। पर रागिनी को तो कोई साथ लेकर जाता ही नहीं था। आखिर उसके पीछे घर का काम जो रुक जाएगा। ऐसे में तोहफे भी तो बड़ी बहू ही खरीद कर लाएगी।
वो मन ही मन सोचने लगी। आखिर तोहफे वाली बहू अक्सर सेवा करने वाली बहू पर भारी पड़ जाती है। मम्मी जी हर समय सुरेखा भाभी की तारीफ करती रहती है। जबकि सुरेखा
भाभी कभी उन्हें एक गिलास पानी उठाकर तक नहीं देती। और यहां दिन भर वो लगी भी रहे तो उसकी कोई वैल्यू नहीं है।
तभी बाहर से रमा जी की आवाज आई,
" अरे छोटी बहू, जरा एक कप चाय और बढ़ा देना। तुम्हारी मामी सास आई है। और उनके लिए भी नाश्ता ले आना। वैसे भी तेरे हाथ की पकौड़ियां इन्हें बहुत पसंद है"
" चलो, ये तो अच्छा है कि मम्मी जी ने कुछ तारीफ तो की। किसी और के बहाने ही सही। कम से कम बोली तो सही कि मैं कुछ तो अच्छा बनाती हूं"
मन ही मन सोचती हुई रागिनी नाश्ते और चाय की ट्रे लेकर बाहर आ गई। सब को चाय नाश्ता सर्व करने के बाद मामी जी के पैर छुए और फिर वापस अपनी रसोई में आ गई। अभी गैस बंद कर खुद के लिए चाय नाश्ता लेकर कमरे में जा ही रही थी कि इतने में बड़ी बहू सुरेखा भी आ गई और आते से ही गरिमा को आवाज देकर बोली,
" रागिनी मेरा चाय नाश्ता भी यही ले आना। आज मामी जी काफी दिनों बाद आई है। मैं भी जरा मामी जी के पास बैठकर बात कर लूं। वरना नौकरी के चक्कर में मिलना भी
कहां हो पता है"
नाश्ता अपने कमरे में ले जाती हुई रागिनी के पैर वही ठिठक गए। तभी मामी जी बोली,
" अरे सुरेखा बहु हाथ मुंह धोने तो जाएगी ही। अपना नाश्ता भी ले आना। रागिनी भी कब से काम में लगी हुई है "
" अरे भाभी उसे क्या करना होता है। दिन भर घर में ही तो रहती है। बड़ी बहू को तो बाहर जाकर कमाना भी पड़ता है। कितना थक जाती है"
अचानक रमा जी बीच में ही बोल पड़ी।
अब जब सास ही बोल रही है तो भला मामी सास की क्या औकात कि वो बीच में बोल दे। पर फिर भी मामी सास
हिम्मत करके बोल ही दी,
" जीजी घर में काम करने वाला भी थक जाता है। घर का काम भी तो आसान बात नहीं होती है"
" अरे तो सिर्फ चाय नाश्ता लाकर पकड़ाना ही तो है। भला वहां से यहां आकर देने में कोई थकता है क्या"
आखिर रमा जी अपने पक्ष में बोली।
तो मामी सास चुप हो गई। रागिनी के हाथ में जो चाय नाश्ता था, वो उसे सुरेखा को देने बाहर आ गई और देकर वापस रसोई में चली गई।
वापस गैस चालू किया और अपने लिए पकौड़ियां तलने लगी। पकौड़ी तलकर गैस बंद कर अपने लिए चाय नाश्ता लेकर वो बाहर वहीं पर आ गई, जहां सब लोग बैठे थे। देखा तो सुरेखा सबको कोई नयी साड़ी खोलकर दिखा रही थी।
सभी औरतें साड़ी देखने में मगन थी वही रागिनी एक कुर्सी पर बैठकर अपना नाश्ता करने लगी। तभी सुरेखा बोली,
" मुझे तो ये साड़ी देखते ही पसंद आ गई। तो सोचा क्यों ना मम्मी जी के लिए लेकर चलूं। मम्मी जी पर ये ज्यादा अच्छी लगेगी"
ये सुनकर रमा जी सुरेखा की बलिया लेते हुए बोली,
" देखा मेरी बड़ी बहू मेरा कितना ध्यान रखती है। खुद की शॉपिंग के लिए गई थी। पर मेरे लिए भी साड़ी खरीद कर लाई है"
उनके ऐसा कहते ही रागिनी के हाथ जहां थे वहीं रुक गए, वहीं सुरेखा मुस्कुराने लगी।
तभी मामी सास बोली,
" क्यों जीजी छोटी बहू भी तो कितना ध्यान रखती हैं आपका। आपका हर काम तो वही करती है"
" अरे भाभी अब ये घर में रहती है तो काम तो उसी को करना पड़ेगा ना"
रमा जी ने उत्तर देकर उन्हें चुप कर दिया। तभी एक कागज का टुकड़ा नीचे गिरा। रागिनी ने उसे उठाया तो देखा सुरेखा भाभी ने जो साड़ियां खरीदी है ये उसकी रसीद थी। जिसमें तीन-तीन हजार के दो साड़ी थी और एक साड़ी पांच सौ रूपए की। पर रमा जी की साड़ी तो 500 की ही लग रही थी। तभी रागिनी बोली,
" दीदी आपने आज तीन साड़ियां खरीदी थी? पर ये तो एक ही है"
ये सुनते ही सुरेखा झेंप गई और बोली,
" हां, वो मेरी साड़ियां तो मैं तैयार करवाने के लिए छोड़ आई थी ना। पर मम्मी जी की साड़ी में यहां ले आई। अगर उन्हें पसंद नहीं आती तो बदलवानी पड़ती ना मुझे। इसलिए उनकी साड़ी तैयार करने के लिए देकर नहीं आई"
कहते हुए सुरेखा ने रागिनी से रसीद ले ली। और उसे अपने बैग में रख लिया।
खैर, बात आई गई हो गई।
कुछ दिनों बाद रमा जी का पैर फिसलने से फ्रैक्चर हो गया। अब अपने जरूरी कामों के लिए भी अपनी बहू पर निर्भर थी। ऐसे में छोटी बहू ही उनकी सेवा कर रही थी। पर अभी
भी उनकी आंखों से बड़ी बहू के तोहफों की पट्टी नहीं हटी थी।
सुरेखा उनके लिए गाउन खरीद के लाई थी और उन्हें दिखाते हुए बोली,
" देखिए मम्मी जी मैं आपके लिए गाउन खरीद कर लाई हूं। आपको साड़ी पहनने में दिक्कत होती होगी ना। इसलिए आप अब से गाउन पहनो "
उसकी बात सुनकर रमा जी खुश हो गई।
इतने में मामी सास उनसे मिलने के लिए आई। उन्हें देखकर रमा जी बोली,
" देखो भाभी सुरेखा मेरे लिए गाउन खरीद कर लाई है। कितना ख्याल रखती है मेरा। मेरी तकलीफ तो इससे बिल्कुल देखी ही नहीं जाती"
" हां, वो तो मुझे दिख रहा है जीजी। अब आपकी तबीयत कैसी है"
"तबीयत तो ठीक है भाभी, पर अभी उठकर अपने काम नहीं कर पाती हूं"
कहकर उन्होंने रागिनी को आवाज़ लगाई,
"छोटी बहु मुझे बाथरूम जाना है। जल्दी से आ जा"
लेकिन रागिनी नहीं आई। ये देखकर उन्होंने दोबारा उसे आवाज दी,
"छोटी बहू कहां रह गई तू"
तभी मामी सास बोली,
" अरे जीजी रागिनी नहीं आ रही है तो क्या हुआ? सुरेखा भी तो यही खड़ी है। वो ले जाएगी आपको बाथरूम "
उनकी बात सुनते ही सुरेखा सकपकाते हुए बोली,
"अरे मामी जी, मेरा फोन बज रहा है। एक जरूरी फोन आने वाला था। बस मैं अभी आई"
बिना जवाब की प्रतीक्षा किए सुरेखा फटाफट कमरे के बाहर निकल गई। यह देखकर रमा जी हैरान रह गई। जबकि मामी सास बोली,
" क्या हुआ जीजी? आपकी तोहफे वाली बहू ने निहाल नहीं किया?"
" अरे बस भाभी, वो आती ही होगी। उसका जरूरी फोन आ गया था "
कह कर रमा जी दरवाजे की तरफ देखने लगी। ये देखकर मामी सास बोली,
" जीजी आप इंतजार ही करते रहो। वो नहीं आएगी। क्या एक फोन आपसे ज्यादा जरूरी हो गया? आज तक आपकी बड़ी बहू ने आपको पानी का गिलास भी उठा कर दिया है जो वो आपको बाथरूम तक लेकर जाएगी "
उनकी बात सुनकर रमा जी कुछ कह ही नहीं पाई।
" जीजी रागिनी को तो मैंने बाहर फल लेने भेजा है। आते समय मैं आपके लिए फल नहीं ले पाई थी। इसलिए वो नहीं आई। और अब आपकी बड़ी बहू भी नहीं आने वाली। तो चलिए मैं ही आपको बाथरूम ले चलती हूं"
कहते हुए मामी सास रमा जी को सहारा देते हुए बाथरूम तक ले गई।
वापस लाकर उन्हें वापस बिस्तर पर लेटाते हुए मामी सास बोली,
" जीजी में बुराई नहीं कर रही हूं। तोहफे वाली बहू के सामने आपको काम करने वाली बहू नहीं दिखती। लेकिन आपकी ये जो तुलना करने की आदत है ना, ये आप पर भारी पड़ जाएगी। अगर किसी दिन रागिनी ने भी अपने हाथ खड़े कर लिए तो"
उनकी बात सुनकर रमा जी ने कुछ नहीं कहा।
पर इतना जरूर हुआ कि अब उन्होंने बहूओं में काम बराबर बांट दिया। अब तोहफे वाली बहू को भी बराबर काम करने पड़ते थे। इसलिए उसने भी धीरे-धीरे तोहफें लाने बंद कर दिये।

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