आज की कहानी: जुड़वा भाई

 आज की कहानी: जुड़वा भाई

मैं अपने प्रोजेक्ट के कार्य की देखरेख कर रहा था कि सहसा मेरे मोबाईल की रिंग बज उठी। मैंने देखा गांव से मां का फ़ोन था। मैंने हड़बड़ा कर फोन उठाया क्योंकि मां बिना बहुत जरूरी काम के कभी फोन नहीं करती। मैं ही उसे फोन करता रहता था। उधर से मां बोली,

"बेटा, कुछ अफसर लोग आये थे और बता रहे थे कि यहां पर राष्ट्रीय मार्ग बनने वाला है जिसकी जद से आपका घर तो बच जायेगा पर - - - - -।

बोलते- बोलते मां चुप हो गई। मेरी जान हलक में अटक गई। मैं खिसिया के लगभग

खीजते हुए बोल पड़ा,

"मां जल्दी बताओ न क्या बात है ?" मां बोली,

"आपका घर तो बच जाएगा पर यह सामने वाला नीम का पेड़ जिसे तू बचपन से अपना जिगरी भाई मानता आया है उसकी बली देना पड़ेगी।" मां का रुआंसा सा स्वर था।

मैं भी अंदर तक हिल गया। मां बताती थी कि जिस दिन तेरा जन्म हुआ उसी दिन तेरे बाबूजी ये पंद्रह- बीस दिन का नीम का पेड़ ले आये थे और रोप दिया था। फिर मुझसे बोले थे पार्वती ये अपने मन्नू (मनोहर ) का जुड़वा भाई है। इसकी भी अपने मन्नू की तरह देखभाल करना। फिर मेरे बड़े होते में मां ने भी मेरे मन में भरा दिया कि बेटे ये

तेरा जुडवा भाई है। इसका अपनी तरह ख्याल रखना। फिर हम दोनों साथ बड़े होते गए। मैं बड़े ही चाव से उसका ध्यान रखता। अपने बड़े भाई को पानी देता।उसकी कोपलें खता और निबोली खाता। उसकी निबोली भी बहुत मीठी हुआ करती है। गर्मी के दिनों में मैं उसी के नीचे उसकी छाँव में खटिया डाल कर पड़ा रहता। मां बड़ पूर्णिमा के दिन बड़ के साथ इस नीम की भी पूजा सेवा करती। ये पूरा दृश्य मेरी आँखों के सामने चल चित्र की तरह घूम गया। मैं मां से बोला,

"मां, में अपनी कार से अभी निकल रहा हूँ दो घंटे में पहुंच जाऊंगा।"

गांव पहुंच कर मां को देखा तो वो सहमी सी बैठी थी। दोचार पास पड़ोस वाली चाची -मामी भी मां को घेरे बैठी थीं। जैसे कोई मातम मना रहे हों। मां को एक जोरदार झप्पी देते हुए मैं बोला,

"मां चिंता की कोई बात नहीं अब मैं आ गया हूँ न। बहुत भूख लगी है कुछ अच्छा सा बना कर खिला दे।

शाम को मैं सर्वे वालों के पास गया। अभी कार्य शुरुवाती स्थिति मैं ही था। मैंने पूरी बात जानी। मैं भी सिविल इंजीनियर था पूरी बात जानकर मुझे अच्छा तो लगा कि राज मार्ग बन रहा। गांव का विकास होगा। पर पर्यावरण की रक्षा का भी तो हमारा दयित्व है। मैं टीम के लीडर से बोला,

"सर, आपका प्लान तो बहुत अच्छा है। पर जिस प्लान पर आप रास्ता बन रहें हैं। उस मार्ग में बीस फल दार पेड़ काटने पड़ेगें। यदि इसे थोड़ा घुमा दिया जय तो उस रस्ते में छह ही पेड़ शहीद होंगे। जिनमें से भी दो तो सूखे ठूँढ ही हैं।"

सर ने ध्यान दिया और बोले,

"वाह सहाब,आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने हमारा मार्ग दर्शन किया। वर्ना हम इतने सारे पेड़ों के हत्यारे बन जाते।"

अपने भाई की रक्षा कर अब मैं अपने "जिगरी भाई" से लिपटने और मां को यह शुभ समाचार देने कि तेरे दूसरे बेटे की जान बच गई है। मैं अपने घर की तरफ निकल पड़ा। सूचना तो मैं फोन पर भी दे देता पर फिर मां के चेहरे की चमक और खुशी कैसे दिखती ?

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