hindi-kahani

 "पत्नी के देहांत के बाद "बुजुर्ग, रिटायर्ड मास्टर बनवारी लाल गाँव छोड़कर मुम्बई में अपने बेटा शिवम के बड़े से मकान में आये। शिवम बहुत मनुहार के बाद यहाँ ला पाया। यद्यपि वह पहले भी कई बार प्रयास कर चुका था किंतु अम्मा ही बाबूजी को यह कह कर रोक देती थी कि 'कहाँ बेटे बहू की ज़िंदगी में दखल देने चलेंगे। यहीं ठीक है। सारी जिंदगी यहीं गुजरी है और जो थोड़ी सी बची है उसे भी यहीं रह कर काट लेंगे।

बस पिताजी की इच्छा मर जाती। पर इस बार कोई साक्षात अवरोध नहीं था और पत्नी की स्मृतियों में बेटे के स्नेह से अधिक ताकत नहीं थी इसलिए बनवारी लाल बम्बई आ ही गए।

घर में घुसते ही बनवारी लाल ठिठक कर रुक गए। गुदगुदी मैट पर पैर रखे ही नहीं जा रहे हैं उनके। दरवाजे पर उन्हें रुका देख कर शिवम बोला - "आइये बाबूजी, अंदर आइये।"

"बेटा, मेरे गन्दे पैरों से यह चटाई गन्दी तो नहीं हो जाएगी।" "बाबूजी, आप उसकी चिंता न करें। आइये यहाँ सोफे पर बैठ जाइए।"

सहमें हुए कदमों में चलते हुए बनवारी लाल जैसे ही सोफे पर बैठे तो उनकी चीख निकल गयी अरे रे! मर गया रे !

उनके बैठते ही नरम और गुदगुदा सोफा की गद्दी अन्दर तक

धँस गयी थी। इससे बनवारी लाल चिहुँक कर चीख पड़े थे।

चाय पीने के बाद शिवम ने बनवारी लाल से कहा - "बाबूजी, आइये आपको घर दिखा दूँ अपना।"

"जरूर बेटा, चलो।"

• "बाबू जी, यह है लॉबी जहाँ हम लोग चाय पी रहे थे। यहाँ पर कोई भी अतिथि आता है तो चाय नाश्ता और गपशप होती है। यह डाइनिंग हाल है। यहाँ पर हम लोग खाना खाते हैं। बाबूजी, यह रसोई है और इसी से जुड़ा हुआ यह भण्डार घर है। यहाँ रसोई से सम्बंधित सामग्री रखी जाती हैं। यह बच्चों का कमरा है।"

• "तो बच्चे क्या अपने माँ बाप के साथ नहीं रहते?"

• बाबूजी, यह शहर है और शहरों में मुंबई है। यहाँ बच्चे को जन्म से ही अकेले सोने की आदत डालनी पड़ती है। माँ तो बस समय समय पर उसे दूध पिला देती है और उसके शेष कार्य आया (बेबीसिटर) आकर कर जाती है।"

थोड़ा ठहर कर शिवम ने आगे कहा, "बाबूजी यह आपकी बहू और मेरे सोने का कमरा है... और इस कोने पर यह गेस्ट रूम है। कोई अतिथि आ जाय तो यहीं ठहरता है। यह छोटा सा कमरा पेट्स के लिए है। कभी कोई कुत्ता आदि पाला गया तो उसके लिए व्यवस्था कर रखी है।"

सीढियां चढ़ कर ऊपर पहुँचे शिवम ने लम्बी चौड़ी छत के एक कोने में बने एक टीन की छत वाले कमरे को खोल कर दिखाते हुए कहा - "बाबूजी यह है घर का स्टोर रूम (कबाड़खाना)। घर की सब टूटी फूटी और बेकार वस्तुएं यहीं पर एकत्र कर दी जाती हैं। और दीवाली- होली पर इसकी सफाई कर दी जाती है। ऊपर ही यह एक बाथरूम और टॉइलट भी बना हुआ है।"

बनवारी लाल ने देखा कि इसी कबाड़ख़ाने के अंदर एक फोल्डिंग चारपाई पर बिस्तर लगा हुआ है और उसी पर उनका झोला रखा हुआ है

बनवारी लाल ने पलट कर मयंक की तरफ देखा किन्तु वह नीचे जा चुका था।

बनवारी लाल चारपाई में बैठ कर सोचने लगे कि 'कैसा यह मकान है।

"जहाँ भविष्य में पाले जाने वाले पशु के लिए कमरे का विधान कर लिया जाता है, किंतु बूढ़े "माँ बाप" के लिए नहीं। इनके लिए तो कबाड़ का कमरा ही उचित आवास बना है।" छी "लानत, है ऐसी औलाद पर....

नहीं.. अभी मैं कबाड़ नहीं हुआ हूँ। शिवम की माँ की सोच बिल्कुल सही थी। मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।'

अगली सुबह जब शिवम बनवारी लाल के लिए चाय लेकर ऊपर गया ! तो कक्ष को खाली पाया। बाबू जी का झोला भी नहीं था वहाँ। उसने टॉयलेट व बाथरूम भी देख लिये किन्तु बाबूजी वहाँ भी नहीं थे। वह झट से उतर कर नीचे आया तो पाया कि मेन गेट खुला हुआ है। रामू से टिकिट लेकर गाँव वापसी के लिए गाड़ी में बैठ चुके थे। उन्होंने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर देखा कि उनके 'अपने घर' की चाभी मौजूद थी। उन्होंने उसे कस कर मुट्ठी में पकड़ लिया। चलती हुई गाड़ी में उनके चेहरे को छू रही हवा उनके इस निर्णय को और मजबूत बना रही थी।!(N)!

दोस्तों:-

माता-पिता को कबाड़ ना समझे उनका प्यार और सम्मान किसी पुरानी या बेकार चीज की तरह नहीं है बल्कि वह जीवन भर प्रेम और त्याग का प्रतीक है! उन्हें अपने जीवन की सबसे कीमती संपत्ति और एक अनमोल धरोहर की तरह संभालना चाहिए! क्योंकि उनके त्याग और समर्पण के बिना हम आज कुछ नहीं होते, पिता के बलिदान प्रेम और समर्थन का कोई मूल्य नहीं आंका जा सकता वह हमारे जीवन की सबसे बड़ी दौलत है ! उन्हें पुरानी और बेकार चीज की तरह फेंक देना उनके जीवन भर के प्रयासों का अनादर है, हमें हमेशा उनके प्रति कृतज्ञता आभारी और सम्मान पूर्ण रहना चाहिए!!..

धन्यवाद🙏🙏.🌹❤🌹

कोई टिप्पणी नहीं

अमिताभ बच्चन ने अपनी जीवनी में लिखा है

अमिताभ बच्चन ने अपनी जीवनी में लिखा है— "मैं उस समय अपने करियर के शिखर पर था। एक दिन मैं प्लेन से यात्रा कर रहा था। बहुत ही साधारण शर्ट...

Blogger द्वारा संचालित.