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"समधी जी," दीनानाथ जी का गला रुंधा हुआ था, "आपने सात दिन के लिए बेटी मांगी थी, पर उन सात दिनों ने हमें बता दिया कि हम कितने गरीब हैं। हमने कभी मीरा के काम को, उसके प्यार को नहीं देखा। हमें माफ़ कर दीजिये। हम आज अपनी बहू को नहीं, अपने घर की लक्ष्मी को ससम्मान वापस ले जाने आए हैं।"
रविवार की सुहानी शाम थी। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और ड्राइंग रूम में टीवी पर पुराना क्रिकेट मैच चल रहा था। सोफे पर ससुर जी, दीनानाथ जी, अख़बार के पन्ने पलट रहे थे। सास, सावित्री देवी, अपनी बेटी नेहा और छोटे बेटे सुमित के साथ बैठकर हंसी-मज़ाक कर रही थीं। बीच-बीच में सुमित की आवाज़ गूँज उठती, "भाभी! पकोड़े थोड़े और करारे करना, और वो हरी वाली चटनी भी लेते आना!"
रसोई के अंदर उमस और गर्मी के बीच मीरा खड़ी थी। माथे से पसीना बहकर उसकी बिंदी को भिगो रहा था। पति, रोहन, कंपनी के काम से पंद्रह दिन के लिए सिंगापुर गया हुआ था। मीरा सुबह पांच बजे से मशीन की तरह लगी हुई थी। ससुर जी की बिना चीनी की चाय से लेकर, सास की घुटनों की मालिश, और देवर-ननद की फरमाइशों के बीच उसे खुद पानी पीने की फुर्सत नहीं मिली थी।
तभी बाहर डोरबेल बजी। मीरा ने पल्लू से पसीना पोंछा और बाहर झांका। दरवाज़े पर उसके माता-पिता, रघुनाथ जी और सुशीला खड़ी थीं। वे पास ही के एक रिश्तेदार के यहाँ से लौट रहे थे और अचानक बेटी से मिलने चले आए। मीरा का चेहरा उन्हें देखते ही खिल उठा। वह दौड़कर बाहर आई और माँ के गले लग गई।
सुशीला की नज़र अपनी बेटी के थके हुए चेहरे, अस्त-व्यस्त बालों और बेसन से सने हाथों पर गई। वो बेटी जो मायके में पानी का गिलास भी खुद नहीं उठाती थी, आज पूरे घर का बोझ अपने कमज़ोर कंधों पर उठाए मुस्कुरा रही थी।
औपचारिकताएं हुईं। दीनानाथ जी और सावित्री देवी ने रघुनाथ जी का स्वागत किया। चाय-नाश्ते के बीच सुशीला ने अचानक एक बात कह दी, "समधी जी, अगले हफ़्ते रोहन भी वापस आ ही रहा है। हम सोच रहे थे कि तब तक के लिए मीरा को अपने साथ ले जाएं। बहुत दिन हो गए, घर में कुछ पूजा भी है। जब रोहन आएगा, तो वहीं से उसे वापस ले आएगा।"
दीनानाथ जी ने बिना एक पल गंवाए कहा, "अरे, इसमें पूछने की क्या बात है? बहू की जैसी मर्ज़ी हो, हम तो वैसे ही राज़ी हैं। आप शौक से ले जाइये। यहाँ सावित्री और नेहा हैं, घर का काम देख लेंगी।"
सावित्री देवी ने भी हामी भरी, "हाँ-हाँ, ले जाइये। मीरा को भी थोड़ा आराम मिल जाएगा।"
मीरा ने अपना एक छोटा सा बैग तैयार किया और माता-पिता के साथ विदा हो गई। घर वालों को लगा कि बहू ही तो गई है, सात दिन की ही तो बात है, कोई पहाड़ थोड़े ही टूट पड़ेगा।
लेकिन असली कहानी मीरा के जाने के अगले दिन से शुरू हुई।
सोमवार की सुबह दीनानाथ जी की आँख खुली तो सुबह के सात बज चुके थे। हमेशा मीरा छह बजे उनके बिस्तर के पास गरम पानी और उनकी दवाइयां रख देती थी। आज वो खुद उठकर रसोई में गए। सावित्री देवी अभी सो रही थीं और नेहा के उठने का तो कोई सवाल ही नहीं था। रसोई में जूठे बर्तनों का ढेर लगा था क्योंकि रात को किसी ने उन्हें समेटने की ज़हमत नहीं उठाई थी।
दोपहर होते-होते घर का नक़्शा बिगड़ चुका था। सुमित अपनी ऑफिस की फाइल ढूंढते हुए पूरे घर में चिल्ला रहा था, "मम्मी, मेरी नीली फाइल कहाँ है?" सावित्री देवी झुंझला कर बोलीं, "मुझे क्या पता? तेरी भाभी रखती है सब कुछ।"
शाम को जब सावित्री देवी के घुटनों में दर्द उठा, तो उन्हें याद आया कि मीरा बिना उनके कहे, रोज़ रात को हल्का गरम तेल लेकर उनके पास बैठ जाती थी और घंटों उनके पैर दबाती थी। नेहा ने एक दिन तेल लगाया, पर दूसरे दिन कह दिया, "मम्मी, मेरे हाथों में दर्द हो रहा है।"
तीसरे दिन घर में एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई। खाना बाहर से मंगवाया जा रहा था क्योंकि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि दीनानाथ जी का फीका खाना और सुमित का मसालेदार खाना एक साथ कैसे बनेगा। दीनानाथ जी को अख़बार पढ़ते समय कोई टोकने वाला नहीं था, "बाबूजी, चश्मा लगाकर पढ़िए, आँखें ख़राब हो जाएंगी।" सुमित को याद आ रहा था कि कैसे रात को देर से आने पर भाभी हमेशा उसका इंतज़ार करती थीं और उसे गरम खाना परोस कर ही सोती थीं।
घर का हर कोना, हर सामान मीरा की याद दिला रहा था। वो सिर्फ रोटियां नहीं बेलती थी, उसने इस पूरे परिवार को एक धागे में पिरो कर रखा था। सावित्री देवी को अब समझ आ रहा था कि जिस मीरा को वो सिर्फ एक 'काम करने वाली बहू' समझती थीं, वो असल में इस घर की धड़कन थी। दीनानाथ जी का वो वाक्य, "हम तो वैसे ही राज़ी हैं," अब उन्हें खुद पर एक तंज लग रहा था। उन्होंने मीरा को एक इंसान नहीं, एक आदत मान लिया था—ऐसी आदत जिसे उन्होंने कभी सम्मान नहीं दिया।
सातवें दिन रोहन सिंगापुर से वापस लौटा। उसने सोचा था कि घर जाते ही मीरा दरवाज़ा खोलेगी। लेकिन जब वो घर पहुंचा तो वहाँ का नज़ारा देखकर दंग रह गया। घर बिखरा हुआ था, माँ के चेहरे पर उदासी थी और बाबूजी चुपचाप बैठे थे।
"क्या हुआ माँ? मीरा कहाँ है?" रोहन ने घबराते हुए पूछा।
सावित्री देवी की आँखों से आंसू छलक पड़े। "बेटा, वो अपने मायके गई है। और पीछे से हमें ये सिखा गई है कि हम उसके बिना कुछ भी नहीं हैं। हमने उसे मशीन समझा था, पर वो तो हमारी सांसें थी।"
रोहन कुछ समझ नहीं पाया, लेकिन दीनानाथ जी तुरंत खड़े हुए। "रोहन, गाड़ी निकाल। हम मीरा को लेने जा रहे हैं।"
जब रोहन, दीनानाथ जी और सावित्री देवी रघुनाथ जी के घर पहुंचे, तो मीरा उन्हें देखकर हैरान रह गई। उसे लगा कोई अनहोनी हो गई है।
दीनानाथ जी आगे बढ़े और उन्होंने रघुनाथ जी के सामने हाथ जोड़ लिए।
"समधी जी," दीनानाथ जी का गला रुंधा हुआ था, "आपने सात दिन के लिए बेटी मांगी थी, पर उन सात दिनों ने हमें बता दिया कि हम कितने गरीब हैं। हमने कभी मीरा के काम को, उसके प्यार को नहीं देखा। हमें माफ़ कर दीजिये। हम आज अपनी बहू को नहीं, अपने घर की लक्ष्मी को ससम्मान वापस ले जाने आए हैं।"
मीरा की आँखों से आंसू बह निकले। सावित्री देवी ने उसे गले लगा लिया और धीरे से कहा, "अब से तुझे किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है मेरी बच्ची। तू इस घर की मालकिन है।"
उस दिन जब मीरा वापस लौटी, तो वो रसोई में काम करने वाली एक थकी हुई बहू नहीं थी। वो एक ऐसी बेटी थी जिसका मान और सम्मान उस परिवार ने अपनी आत्मा से स्वीकार कर लिया था। कभी-कभी अपनों से थोड़ी सी दूरी, रिश्तों की सबसे गहरी अहमियत समझा देती है।
क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि घर में माँ या पत्नी के कुछ दिन न रहने पर पूरा घर कैसे थम सा जाता है? क्या हम अक्सर उनके उस अथक परिश्रम को 'उनका फर्ज़' मानकर नज़रअंदाज़ नहीं कर देते? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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