kahani
दिन भर की आपाधापी और दफ़्तर के ऊबाऊ काम से निवृत्त होकर, आरव ने घड़ी देखी – शाम के छः बज रहे थे। हमेशा की तरह, उसने गोरेगांव लोकल पकड़ी और घर की ओर निकल पड़ा। मन में हल्की थकान थी, पर शाम की चाय और घर के आराम का ख्याल सुकून दे रहा था। तभी फ़ोन बजा। सामने उसके दोस्त, रोहन, का नाम चमक रहा था।
"आरव! कहाँ हो?" रोहन की आवाज़ सुनाई दी।
"बस, लोकल में बैठा हूँ। क्या हुआ?"
"सुन, सिद्धिविनायक मंदिर के पास वाले पार्क में रुक जाना। थोड़ा ज़रूरी काम है तुझसे।"
आरव ने हामी भरी और गोरेगांव स्टेशन पर उतरकर सिद्धिविनायक मंदिर के पास बने शांत पार्क की ओर चल पड़ा। रोहन का इंतज़ार करते हुए, वह पार्क की एक बेंच पर बैठ गया, लोगों की आवाजाही और गाड़ियों के शोर से बेखबर।
तभी, एक साठ-पैंसठ साल के बूढ़े बाबा, फटे-पुराने कपड़ों में, आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा लगाए, लड़खड़ाते हुए आरव के पास आए और अचानक उसके पैर पकड़ लिए। उनकी आवाज़ में दीनता और भूख की टीस थी, "बेटा... बहुत भूख लगी है। एक प्लेट पूरी-भाजी दिलवा दोगे?"
वह कोई पेशेवर भिखारी नहीं लगते थे। उनकी आँखों में याचना थी, पर चेहरे पर स्वाभिमान की एक महीन परत भी थी, जो भीख मांगने की आदत से कोसों दूर थी। आरव एकदम से हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। इस अप्रत्याशित घटना और बाबा की हालत देखकर उसके भीतर एक संकोच और करुणा का भाव उमड़ा।
"बाबाजी, भूख लगी है?" आरव ने नरमी से पूछा।
उसने झट से जेब में हाथ डाला और एक सौ रुपए का नोट निकाला, बाबा के हाथ में रखना चाहा। पर बाबा ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया, "नहीं बेटा, इतने ज़्यादा नहीं। बस, खाने लायक़ पैसे दे दो।"
आरव का दिल भर आया। वह पास की एक दुकान पर गया और गरमागरम पूरी-भाजी की दो प्लेटें ले आया। बाबा वहीं पार्क में ज़मीन पर बैठ गए और बड़ी तृप्ति से खाने लगे। आरव उनके पास ही खड़ा रहा।
"बाबाजी, कहाँ से आए हैं? कहाँ जाना है? किसी को ढूंढ रहे हैं क्या?" आरव ने जिज्ञासा से पूछा।
निवाला निगलते हुए बाबा ने जवाब दिया, "मैं नासिक के पास एक छोटे से गाँव से आया हूँ। मेरा बेटा... तुम्हारी उम्र का होगा। यहाँ मुंबई में किसी बड़ी आईटी कंपनी में काम करता है। दो साल पहले उसने लव मैरिज की थी। उसकी पढ़ी-लिखी पत्नी को हमारे गाँव का माहौल पसंद नहीं आया, सो वो यहीं अलग रहने लगे। परसों ही उसका फ़ोन आया था... बता रहा था कि उसे कनाडा में नौकरी मिली है। पत्नी के साथ सात साल के लिए वहीं जा रहा है।"
बाबा की आवाज़ में गर्व और पीड़ा का अजीब मिश्रण था। उन्होंने आगे कहा, "मुंबई से तो साल-छह महीने में एक बार गाँव आता रहता था, पर अब सात साल के लिए इतनी दूर जा रहा है... मैंने कहा, जाने से पहले एक बार मिलकर तो जा। पर कहने लगा, 'बाबाजी, निकलने की बहुत जल्दी है, समय नहीं है मिलने का।' मुझे लगा... कौन जाने सात साल बाद मैं रहूँ या ना रहूँ? सोचा, खुद ही चलकर मिल आता हूँ। गाँव में एक दोस्त से थोड़े पैसे उधार लेकर टिकट करवाया। अब मेरे पास लौटने के पैसे नहीं हैं।"
उनकी आँखों में बीते दो दिनों की भटकन और थकावट साफ़ दिख रही थी। "दो दिन से मुंबई में घूम रहा हूँ, लोगों से पूछ रहा हूँ। सब कहते हैं यहाँ सिद्धिविनायक के पास एयरपोर्ट नहीं है, वो तो अँधेरी में है। पर मेरे बेटे ने तो मुझे यही पता लिखवाया था।" कहते हुए उन्होंने अपनी पुरानी सी थैली से एक मुड़ी-तुड़ी कागज़ की पर्ची निकाली। "ये मोबाइल भी लगता है खराब हो गया है। दो दिन से बेटे का कोई फ़ोन नहीं आया।"
"आपने फ़ोन करके पूछा क्यों नहीं?" आरव ने पूछा।
बाबा ने सहमी हुई आवाज़ में कहा, "मुझे फ़ोन करना नहीं आता बेटा।"
आरव ने उनका पुराना फ़ोन लिया। रिसीव्ड कॉल लिस्ट में दो दिन पहले आया सिर्फ़ एक नंबर था। आरव ने उस पर कॉल किया। उधर से तुरंत फ़ोन काट दिया गया। उसने दोबारा, तिबारा कोशिश की। हर बार वही नतीजा।
हारकर, आरव ने बाबा के हाथ से पर्ची ली और उस पर लिखा पता पढ़ा:
अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा – गेटवे ऑफ़ इंडिया, मुंबई।
आरव के सर पर जैसे किसी ने ज़ोर का मुक्का मारा। पल भर में सारा माजरा उसकी समझ में आ गया। माँ-बाप से पीछा छुड़ाने के लिए बेटे ने जानबूझकर ग़लत पता लिखवाया था। और अब फ़ोन भी नहीं उठा रहा था। आरव को यह समझने में एक पल भी नहीं लगा कि जिस दिशा में उस बेटे का हवाई जहाज गया था, उस रिश्ते के वापस आने की संभावना न के बराबर थी। या शायद, बेटा यहीं मुंबई में था, पर अपने बूढ़े पिता से मिलना या उनकी ज़िम्मेदारी लेना नहीं चाहता था।
आरव देख सकता था कि बाबा शायद बेटे की इस उपेक्षा को समझ नहीं पा रहे थे, या जो समझ रहे थे, उसे स्वीकार करने के लिए उनका मन तैयार नहीं था। अपने ही खून की यह बेवफाई उनके लिए असहनीय थी।
आरव ने भारी मन से कहा, "बाबाजी... अब तो हवाई जहाज़ निकल गया होगा। आप वापस गाँव चले जाइए। काकी इंतज़ार कर रही होंगी।"
बाबा ने अपने हाथ में पकड़ी हुई पुरानी सी थैली पर हाथ फेरा। आरव ने ध्यान से देखा, थैली में डिब्बे जैसा कुछ था। "बाबाजी, इसमें क्या है?" उसने पूछा।
बाबा की आवाज़ में हल्की सी चमक आई, "यह तो मेरे बेटे को बेसन के लड्डू बहुत पसंद हैं ना... सो उसकी माँ ने बनाए थे। उसके लिए लाया था।"
यह सुनकर आरव के दिल में ज़ोर का धक्के लगा। एक तीव्र वेदना की लहर उसके पूरे वजूद में दौड़ गई। उसे लगा कि वह उस नालायक़ बेटे की सच्चाई बाबा को बता दे, पर उसकी हिम्मत जवाब दे गई थी। कलेजे के टुकड़े हो रहे थे। वह नि:शब्द, दर्द से भरी आँखों से बाबा को देखता रहा।
"बाबाजी," उसने फिर हिम्मत करके कहा, "अब नासिक के लिए निकल जाइए। देर हो जाएगी। हवाई जहाज तो चला गया।"
नम आँखों से बाबा धीरे-धीरे उठे और लड़खड़ाते कदमों से पार्क से बाहर निकल गए। आरव भी भारी मन से उनके पीछे-पीछे कुछ दूर चला। थोड़ी दूर जाने पर उसे ख्याल आया - बाबा के पास तो लौटने के लिए बस या ट्रेन का टिकट खरीदने के भी पैसे नहीं होंगे!
वह तेज़ी से वापस भागा। बाबा को मुश्किल से ढूंढा और उन्हें मनाकर अपने घर ले आया। "बाबाजी," उसने कहा, "आज रात मेरे घर रुक जाइए। कल सुबह मैं आपको नासिक की ट्रेन में बिठा दूंगा। टिकट का इंतज़ाम मैं कर दूंगा।"
उस रात आरव को देर रात तक नींद नहीं आई। बगल के कमरे में बाबा की भी यही हालत थी, करवटें बदलते हुए।
बार-बार उसके मन में एक ही सवाल कौंध रहा था: वह वृद्ध बाबा, जो एक प्लेट पूरी-भाजी के लिए किसी अजनबी के पैर पकड़ सकते थे, क्या अपनी भूख मिटाने के लिए, अपने बेटे के लिए लाए गए उस डिब्बे से एक बेसन का लड्डू भी नहीं खा सकते थे? पर नहीं... वह लड्डू तो माँ ने बेटे के लिए बनाए थे ना... भला बाप उसे कैसे खा सकता था?
पुत्र प्रेम की यह पराकाष्ठा... यह निस्वार्थ समर्पण... आरव को भीतर तक हिला गया।
अगले दिन सुबह, आरव ने बाबाजी को नासिक जाने वाली ट्रेन में बिठाया। स्टेशन पर विदा लेते हुए बाबा की आँखें फिर नम हो गईं। आरव का मन भी उदास था।
घर लौटा तो उसकी पत्नी, प्रिया, ने कहा, "अरे सुनो जी! बाबाजी बेसन के लड्डू का डिब्बा यहीं भूल गए।"
आरव ने डिब्बे को उठाते हुए कहा, "नहीं प्रिया, वो भूले नहीं हैं। हमारे और तुम्हारे लिए जानबूझकर छोड़ गए हैं।"
डिब्बे में रखे बेसन के लड्डुओं में उसे माँ की ममता और एक लाचार पिता के अनकहे दर्द की सुगंध महसूस हुई।
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