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चिलचिलाती धूप में दिल्ली से वृंदावन जाने वाले रास्ते पर एक कार अचानक रुक गई। कार में एक परम पूज्य संत और उनके शिष्य सवार थे। ब्रज की सीमा में प्रवेश करने की उनकी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी, लेकिन कार के इंजन ने जवाब दे दिया था।
शिष्य ने आस-पास देखा, दूर-दूर तक कोई गैराज नहीं था, बस पास में ही एक पुराना, साधारण सा ढाबा दिखाई दिया। शिष्य ने संत से विनती की, "गुरुदेव, मैकेनिक को आने में समय लगेगा। धूप बहुत तेज़ है, क्यों न हम उस ढाबे में चलकर थोड़ा विश्राम कर लें?"
संत, जो सदैव हरि-स्मरण में लीन रहते थे, अनिच्छा से मान गए।
जैसे ही वे ढाबे पर पहुँचे, वहाँ प्याज़ और लहसुन के तड़के की तीखी गंध आ रही थी। संत का मन विचलित हो गया, क्योंकि वे पूर्णतः सात्विक जीवन जीते थे।
दृश्य २: ढाबा मालिक का प्रेम और संत का प्रण
ढाबे के मालिक ने जब भगवा वस्त्रधारी, तेजस्वी संत को अपनी चौखट पर देखा, तो वह दौड़ा चला आया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतने बड़े महात्मा उसकी छोटी सी दुकान पर पधारे हैं। उसने तुरंत अपने कारीगरों को आदेश दिया, "सब काम छोड़ो!
महाराज जी के लिए एकदम शुद्ध, बिना प्याज़-लहसुन का सात्विक भोजन बनाओ। बर्तन भी नए इस्तेमाल करना!"
कुछ ही देर में गर्मागर्म भोजन तैयार हो गया। मालिक ने बड़े आदर से थाली परोसते हुए कहा, "महाराज, यह गरीब की सेवा स्वीकार करें। भोजन ग्रहण करें।"
संत ने करुणा भरी, लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, "बेटा, तुम्हारी सेवा भावना सराहनीय है। लेकिन मेरा एक नियम है। मैं बिना अपने ठाकुर जी (भगवान) को भोग लगाए अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करता। यहाँ मेरे पास विग्रह नहीं है, इसलिए मैं यह भोजन नहीं कर सकता।"
ढाबे वाला हताश हो गया। शिष्य भी दुखी था क्योंकि गुरुदेव सुबह से भूखे थे। वातावरण में एक अजीब सी उदासी छा गई। भोजन सामने था, भूख भी थी, पर 'नियम' आड़े आ रहा था।
अभी ढाबे वाला थाली वापस ले जाने ही वाला था कि तभी... सन्नाटे को चीरती हुई एक और कार ढाबे के सामने आकर रुकी।
उसमें से एक दम्पति बहुत ही हड़बड़ाहट में बाहर निकले। उनके हाथों में एक सुंदर सी टोकरी थी। वे सीधे ढाबे वाले के पास आए और बोले, "भैया! क्या यहाँ शुद्ध सात्विक भोजन मिल सकता है? हमें बहुत देर हो गई है।"
उन्होंने अपनी टोकरी से पर्दा हटाया। अंदर साक्षात 'लड्डू गोपाल' (बाल कृष्ण) विराजमान थे।
दम्पति ने कहा, "हम वृंदावन से दिल्ली जा रहे थे, लेकिन रास्ते में एक दुर्घटना के कारण जाम लगा था। हमें घंटों वहीं रुकना पड़ा। हमारे गोपाल जी के भोग का समय निकल रहा है। ये भूखे हैं। क्या जल्दी से कुछ शुद्ध मिल पाएगा?"
यह सुनते ही ढाबे वाले और शिष्य के रोंगटे खड़े हो गए। जो भोजन अभी-अभी संत के लिए बना था और अस्वीकार कर दिया गया था, वह मानो गोपाल जी के लिए ही बना था!
ढाबे वाला कांपते हाथों से वह थाली ले आया। दम्पति ने बड़े प्रेम से गोपाल जी को उस भोजन का भोग लगाया। अब वह साधारण भोजन नहीं रहा था, वह 'महाप्रसाद' बन चुका था।
भोग लगने के बाद, जब वह प्रसाद संत के सामने लाया गया, तो संत की दशा देखने लायक थी। वे अपनी जगह से उठे और दौड़ते हुए गोपाल जी के पास गए। उन्होंने वही ज़मीन पर लेटकर दण्डवत प्रणाम किया।
उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उनका गला रुंध गया।
संत रोते हुए बोले, "हे कन्हैया! हे मेरे नाथ! तेरी लीला कौन समझ सकता है? आज इस ढाबे पर, जहाँ की गंध से मेरा दम घुट रहा था, तू स्वयं चलकर आया? सिर्फ इसलिए कि मेरा नियम न टूटे? सिर्फ इसलिए कि तेरा यह भक्त भूखा न रह जाए?"
संत ने कांपते हाथों से प्रसाद का ग्रास उठाया और माथे से लगाया। आज उस भोजन में जो स्वाद था, वह अमृत से भी कहीं ज़्यादा मीठा था। वह स्वाद 'भक्ति' का था।
दूसरी ओर, ढाबे वाला कोने में खड़ा यह सब देख रहा था। उसके मन में भी एक तूफ़ान चल रहा था। वह सोच रहा था:
"धन्य है तू सांवरे! मैं तो तुझे घर पर पत्नी के कहने पर कभी-कभार बस मिसरी का भोग लगा देता हूँ। और तू? तू आज मेरे ढाबे पर खुद चलकर आया? सिर्फ इसलिए कि एक संत की इच्छा पूरी हो सके और मेरी सेवा व्यर्थ न जाए? तेरी करुणा का कोई पार नहीं है कान्हा..."
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