शाम के साढ़े सात बज रहे थे। मैं दिल्ली से जयपुर जाने वाली बस में ..

 अपनी खिड़की वाली सीट पर बैठी थी। बस चलने ही वाली थी कि एक करीब 19-20 साल का लड़का, हाथ में एक छोटा सा बैग लिए भागते हुए आया और मेरे बगल वाली सीट पर बैठ गया। उसके चेहरे पर अजीब सी घबराहट थी और वह बार-बार अपने फोन को देख रहा था।

मैंने गौर किया कि उसके हाथ कांप रहे थे। उसने कान में ईयरफोन्स लगाए थे, लेकिन कोई संगीत नहीं बज रहा था—शायद वह दुनिया से कटना चाहता था।कुछ देर बाद उसके फोन की घंटी बजी। उसने स्क्रीन देखी और फोन काट दिया। फिर घंटी बजी, उसने फिर काट दिया।

तीसरी बार फोन आने पर उसने गुस्से में फोन स्विच ऑफ कर दिया और खिड़की के बाहर देखने लगा। उसकी आंखों में आंसू साफ चमक रहे थे।

मैंने धीरे से पूछा, "सब ठीक तो है भाई? पानी चाहिए?"

उसने चौंककर मुझे देखा, अपनी आंखें पोंछीं और बोला, "जी, सब ठीक है। बस सिर में थोड़ा दर्द है।"

मैंने मुस्कुराकर कहा, "सिर का दर्द आंखों से नहीं गिरता। अगर मन हल्का करना चाहो, तो मुझे बता सकते हो?

वह थोड़ी देर चुप रहा, फिर फफक कर रो पड़ा। उसने बताया कि वह जयपुर अपने एक 'ऑनलाइन दोस्त' से मिलने जा रहा है। वह लड़का खुद को एक बड़े म्यूजिक प्रोडक्शन हाउस का एजेंट बताता था और उसने इसे वादा किया था कि वह उसे एक बड़े रियलिटी शो में ब्रेक दिला देगा, बस उसे 50,000 रुपये 'रजिस्ट्रेशन फीस' लेकर तुरंत आना होगा।

उसने बताया, "मैडम, मैंने अपनी मां के सोने के कंगन चुपके से बेच दिए। घर पर किसी को नहीं पता। पापा को लगेगा कि मैं कॉलेज के ट्रिप पर गया हूँ। मुझे डर लग रहा है कि अगर वहां कुछ गलत हुआ तो मैं घर वापस कैसे जाऊँगा?"

मैंने उससे पूछा, "क्या तुमने उस आदमी को कभी करीब से देखा है? क्या उसका ऑफिस का पता असली है?"

उसने अपना फोन ऑन किया और मुझे उस आदमी की प्रोफाइल दिखाई। सोशल मीडिया पर काफी काम करने के कारण मैं प्रोफाइल देखते ही समझ गई कि वह एक 'फेक प्रोफाइल' थी—तस्वीरें किसी और की थीं और जानकारी आधी-अधूरे।

मैंने उसे समझाया, "देखो छोटे भाई, हुनर कभी भी चोरी के पैसों से नहीं चमकता। जो इंसान तुम्हें घर से भागकर और पैसे लेकर बुला रहा है, वह तुम्हें कलाकार नहीं, शिकार बना रहा है।"

मैंने उसे एक सुझाव दिया, "अभी उस आदमी को मैसेज करो कि पैसे चोरी हो गए हैं और तुम खाली हाथ आ रहे हो, क्या वह तुम्हें स्टेशन पर लेने आएगा?"

लड़के ने जैसे ही यह मैसेज भेजा, उधर से जवाब आया—"पैसे नहीं तो यहाँ आने की जरूरत नहीं है, अपना वक्त बर्बाद मत करो।" और तुरंत उसे ब्लॉक कर दिया गया।

लड़का सुन्न रह गया। उसकी आंखों के सामने से पर्दा हट चुका था। वह कांपती आवाज में बोला, "अब मैं मां को क्या जवाब दूंगा? वो कंगन उनके आखिरी गहने थे।"

मैंने कहा, "सच बोल दो। हार मानकर भागने से बेहतर है, गलती मानकर वापस लौट जाना। मां-बाप का दिल बहुत बड़ा होता है।"

उसने वहीं बस में बैठे-बैठे अपनी मां को फोन लगाया। जैसे ही मां की आवाज आई, वह रोते हुए बोला, "मां, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई... मुझे माफ कर दो।"

दूसरी तरफ से मां की आवाज आई, "बेटा, तू ठीक है न? कंगन की फिक्र मत कर, वो तो बस सोना था, तू मेरा हीरा है। तू अगले स्टॉप पर उतर और घर वापस आ जा, तेरे पापा बस स्टेशन लेने आएंगे।"

लड़का अगले ही बस स्टॉप पर उतरा। उसने जाते समय मेरे हाथ जोड़कर कहा, "बहन जी आज आपने मुझे एक ऐसे अंधेरे में गिरने से बचा लिया, जहाँ से शायद मैं कभी नहीं निकल पाता।"

सीख: इंटरनेट की आभासी दुनिया अक्सर वैसी नहीं होती जैसी दिखती है। अपनी महत्वाकांक्षाओं को इतना बड़ा न होने दें कि वे आपको अपनों से दूर कर दें।


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शक......

  "शक...... सुधा अभी सब्जी खरीदकर घर की तरफ मुड़ी ही थी की मोहन के पीछे बाइक पर किसी और को बैठा देख कर ठिठक गई..... एक सुंदर सी औरत चिपक...

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