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 “पापा, हम सोच रहे थे कि घर हमारे नाम कर दीजिए… आप तो हमारे साथ ही रहेंगे, आपको क्या फर्क पड़ेगा?”

राजेश जी ने पूरी जिंदगी नौकरी करते-करते निकाल दी थी। सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे, तनख्वाह बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन इमानदारी बहुत बड़ी थी। उन्होंने अपने दो बेटों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया, शहर में एक छोटा सा घर बनवाया और सोचा था कि बुढ़ापे में यही घर उनकी छांव बनेगा। पत्नी सुशीला जी हमेशा कहती थीं, “हमने बच्चों के लिए किया है, बुढ़ापे में वही हमारा सहारा बनेंगे।” राजेश जी मुस्कुरा देते थे, क्योंकि उन्हें अपने संस्कारों पर भरोसा था।
समय बीता, दोनों बेटे बड़े हुए, नौकरी लगी, शादी हुई। घर में बहुएं आईं तो कुछ दिन तक सब ठीक रहा। लेकिन धीरे-धीरे घर में एक नई चर्चा शुरू हो गई — “प्रॉपर्टी किसके नाम होगी?” बड़े बेटे अमित की पत्नी अक्सर कहती, “आजकल समय का भरोसा नहीं है, पापा को घर हमारे नाम कर देना चाहिए, ताकि भविष्य सुरक्षित रहे।” छोटे बेटे रोहित को भी यही बात समझाई गई कि “अगर अभी नाम नहीं हुआ तो बाद में दिक्कत हो सकती है।” दोनों बेटे अब माता-पिता से कम और अपनी पत्नियों से ज्यादा सलाह लेने लगे थे।
एक दिन रात के खाने के बाद अमित ने हिचकिचाते हुए कहा, “पापा, हम सोच रहे थे कि घर हमारे नाम कर दीजिए… आप तो हमारे साथ ही रहेंगे, आपको क्या फर्क पड़ेगा?” यह सुनकर सुशीला जी के हाथ कांप गए। राजेश जी कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “बेटा, अभी तो हम जिंदा हैं… इतनी जल्दी क्या है?” अमित ने मुस्कुराकर कहा, “अरे पापा, हम तो आपकी सुविधा के लिए कह रहे हैं, ताकि आगे कोई लीगल दिक्कत न हो।” लेकिन उस मुस्कान में अपनापन कम और गणित ज्यादा था।
अगले कुछ हफ्तों तक माहौल बदल गया। बहुएं अब छोटी-छोटी बातों पर ताने देने लगीं। “इतना बड़ा घर है, खर्चा कितना होता है”, “अब तो हमें भी अपने बच्चों का भविष्य देखना है”, “हर चीज का बोझ हमारे ऊपर है” — ये बातें सुनकर सुशीला जी रात-रात भर रोतीं। राजेश जी उन्हें समझाते, “शायद हम ही ज्यादा सोच रहे हैं।” लेकिन सच उन्हें भी दिखने लगा था।
एक दिन रोहित ने भी साफ कह दिया, “पापा, अगर घर अभी हमारे नाम कर देंगे तो हम बैंक से लोन लेकर ऊपर एक फ्लोर बनवा लेंगे… वरना हम अलग शिफ्ट हो जाएंगे।” यह सुनकर जैसे किसी ने राजेश जी के दिल पर पत्थर रख दिया। जिस घर को बनाने में उन्होंने 30 साल की कमाई लगा दी थी, आज वही घर उनके बच्चों के लिए सिर्फ एक ‘एसेट’ बन गया था।
उस रात राजेश जी सो नहीं पाए। उन्होंने पुराने कागज निकाले, घर की रजिस्ट्री देखी और लंबे समय तक उसे देखते रहे। सुबह उन्होंने सुशीला जी से कहा, “तुम तैयार रहना, आज वकील के पास चलना है।” सुशीला जी डर गईं, “क्या सच में घर उनके नाम कर दोगे?” राजेश जी ने गहरी सांस ली, “नहीं… आज एक और फैसला करेंगे।”
कुछ दिनों बाद पूरे परिवार को बुलाया गया। दोनों बेटे और बहुएं उत्सुक थे, उन्हें लगा कि आज उनकी इच्छा पूरी हो जाएगी। राजेश जी ने शांति से कहा, “मैंने वसीयत बनवा दी है। जब तक हम दोनों जिंदा हैं, घर हमारे नाम रहेगा। हमारे जाने के बाद यह घर किसी बेटे के नाम नहीं जाएगा… इसे वृद्धाश्रम को दान कर दिया जाएगा।” कमरे में सन्नाटा छा गया। अमित गुस्से में बोला, “पापा, आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?” रोहित भी चिल्लाया, “हम आपके अपने बच्चे हैं!”
राजेश जी की आवाज़ पहली बार कड़ी हुई, “अपने बच्चे? अपने बच्चे वो होते हैं जो माता-पिता को बोझ नहीं समझते। जिस दिन तुमने इस घर को सिर्फ दीवार और जमीन समझ लिया, उस दिन तुमने इसे अपना हक खो दिया।” सुशीला जी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार वो कमजोरी के नहीं, आत्मसम्मान के थे।
कुछ महीनों बाद दोनों बेटे सच में अलग हो गए। उन्होंने किराए के घर ले लिए। शुरू-शुरू में उन्हें लगा कि उन्होंने सही किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास होने लगा कि किराया देना, बच्चों की फीस भरना और जिंदगी की जिम्मेदारियां संभालना आसान नहीं है। उधर राजेश जी और सुशीला जी ने अपने घर के एक हिस्से में दो बुजुर्ग महिलाओं को किराए पर रखा, जो अपने बच्चों द्वारा छोड़ी जा चुकी थीं। घर में फिर से हंसी लौट आई। वो चारों मिलकर चाय पीते, बातें करते और एक-दूसरे का सहारा बन गए।
एक दिन अमित अचानक घर आया। उसकी नौकरी चली गई थी और उसे आर्थिक मदद की जरूरत थी। दरवाजे पर खड़े होकर उसने पहली बार झिझकते हुए कहा, “पापा… गलती हो गई।” राजेश जी ने उसे अंदर बुलाया, लेकिन इस बार उनका प्यार आंख मूंदकर भरोसा करने वाला नहीं था। उन्होंने कहा, “बेटा, घर ईंटों से नहीं बनता… व्यवहार से बनता है। जिस दिन तुम ये समझ जाओगे, उसी दिन ये घर फिर तुम्हारा हो जाएगा।”
अमित की आँखें झुक गईं। उसे समझ आ चुका था कि प्रॉपर्टी से ज्यादा कीमती रिश्ते होते हैं। लेकिन हर गलती की कीमत होती है।
आज भी उस घर के बाहर नेमप्लेट पर राजेश और सुशीला का नाम चमकता है। अंदर हंसी गूंजती है, लेकिन अब वो हंसी स्वाभिमान की है, मजबूरी की नहीं।
कभी-कभी बच्चों को सबक देने के लिए
माता-पिता को कठोर बनना पड़ता है।

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