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 “जब बहू ने घर छोड़ने के बजाय खुद की कीमत समझ ली”

सुबह के सात बज रहे थे। घर के आंगन में झाड़ू की आवाज गूंज रही थी। नेहा रोज की तरह जल्दी उठकर पूरे घर का काम निपटाने में लगी हुई थी। पहले आंगन साफ किया, फिर रसोई में जाकर चाय बनाई, बच्चों के टिफिन तैयार किए और ससुर जी के लिए नाश्ता भी लगा दिया। यह सब करते-करते उसे खुद चाय पीने का भी समय नहीं मिला था।
नेहा पिछले चार साल से इस घर की बहू थी। जब वह इस घर में आई थी तो उसे लगा था कि धीरे-धीरे सब उसे अपना लेंगे। लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी उसे अक्सर यही एहसास होता था कि इस घर में उसकी कीमत सिर्फ काम करने वाली के बराबर ही है। खासकर उसकी सास कमला देवी को तो हर बात में उससे शिकायत ही रहती थी।
अगर नेहा जरा भी देर से उठ जाए तो कमला देवी तुरंत कह देतीं, “आजकल की बहुओं को बस आराम चाहिए। हमारे जमाने में तो सूरज निकलने से पहले काम शुरू हो जाता था।”
और अगर नेहा सुबह जल्दी उठकर सारे काम निपटा दे तो भी उन्हें कुछ ना कुछ कहने के लिए मिल ही जाता था। “इतनी जल्दी काम खत्म कर दिया? पता नहीं ठीक से किया भी है या नहीं।”
नेहा अक्सर चुप रह जाती थी। वह सोचती थी कि जवाब देने से घर का माहौल खराब होगा। इसलिए वह सब कुछ सहकर भी शांत रहने की कोशिश करती थी।
एक दिन दोपहर को जब नेहा रसोई में सब्जी बना रही थी तभी कमला देवी की बेटी प्रिया अपने पति और बच्चों के साथ मायके आ गई।
जैसे ही प्रिया घर में दाखिल हुई, कमला देवी खुशी से झूम उठीं।
“अरे मेरी बेटी आ गई!” कहते हुए उन्होंने दौड़कर उसे गले लगा लिया।
प्रिया हंसते हुए बोली, “मम्मी इस बार मैं चार-पांच दिन रुकने वाली हूं।”
कमला देवी ने तुरंत कहा, “अरे जितने दिन मन करे उतने दिन रुक। ये घर तेरा ही तो है।”
नेहा रसोई से यह सब देख रही थी। उसे अपनी ननद से कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन वह यह अच्छी तरह जानती थी कि अब अगले कुछ दिन उसके लिए और भी ज्यादा मुश्किल होने वाले हैं। क्योंकि जब भी प्रिया मायके आती थी, घर का हर छोटा-बड़ा काम नेहा के जिम्मे आ जाता था।
थोड़ी देर बाद कमला देवी रसोई में आईं और बोलीं,
“बहू, जल्दी से चाय बना और कुछ अच्छा नाश्ता भी तैयार कर। प्रिया रास्ते से आई है, उसे भूख लगी होगी।”
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अभी बनाती हूं मम्मी जी।”
उसने जल्दी-जल्दी चाय बनाई, पकौड़े तले और बच्चों के लिए सैंडविच भी बना दिए। सबको नाश्ता देने के बाद वह फिर से रसोई में बर्तन साफ करने लगी।
शाम तक नेहा लगातार काम करती रही। रात का खाना बनाने तक उसकी कमर दर्द करने लगी थी।
लेकिन खाने की टेबल पर बैठते ही कमला देवी फिर बोल पड़ीं,
“बहू, दाल में नमक थोड़ा ज्यादा हो गया है।”
नेहा चुप रह गई। उसे पता था कि अगर वह कुछ कहेगी तो बात और बढ़ जाएगी।
रात को जब सब सो गए तो नेहा अपने कमरे में आई। उसका पति अमित मोबाइल देख रहा था।
नेहा ने धीरे से कहा,
“अमित, कभी-कभी लगता है कि इस घर में मेरी कोई कीमत ही नहीं है।”
अमित ने उसकी तरफ देखा और बोला,
“नेहा, मम्मी की आदत है हर बात में शिकायत करने की। तुम दिल पर मत लिया करो।”
नेहा ने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन का दर्द कम नहीं हुआ।
अगले दिन सुबह फिर वही सिलसिला शुरू हो गया। नेहा सुबह से काम में लगी हुई थी और प्रिया अपनी मां के साथ बैठकर बातें कर रही थी।
दोपहर के समय प्रिया ने अचानक कहा,
“मम्मी, आज बाहर से खाना मंगवा लेते हैं। मुझे कुछ अलग खाने का मन कर रहा है।”
कमला देवी ने तुरंत कहा,
“नहीं बेटा, बाहर का खाना क्यों मंगवाना। बहू बना देगी।”
यह सुनकर नेहा के मन में एक अजीब सी थकान भर गई। सुबह से वह लगातार काम कर रही थी, लेकिन किसी ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि वह थकी है या नहीं।
उस दिन पहली बार नेहा ने शांत आवाज में कहा,
“मम्मी जी, अगर आप कहें तो आज बाहर से खाना मंगा लेते हैं। मुझे थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही।”
कमला देवी तुरंत नाराज हो गईं।
“अरे वाह! अब घर का खाना बनाने में भी बहुओं को परेशानी होने लगी है।”
नेहा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस चुपचाप पानी का गिलास उठाया और अपने कमरे में चली गई।
उस रात नेहा ने बहुत देर तक सोचा। उसे समझ में आ गया था कि चाहे वह कितना भी काम कर ले, इस घर में उसकी मेहनत की कद्र नहीं होने वाली।
अगले दिन सुबह नेहा ने पहली बार अपने लिए थोड़ा समय निकाला। उसने जल्दी-जल्दी जरूरी काम किए और फिर अपने कमरे में बैठकर आराम करने लगी।
कमला देवी ने जब देखा कि नेहा रसोई में नहीं है तो उन्होंने आवाज लगाई,
“बहू, क्या कर रही हो?”
नेहा बाहर आई और शांत स्वर में बोली,
“मम्मी जी, बाकी काम मैं थोड़ी देर बाद कर दूंगी। अभी मुझे थोड़ा आराम करना है।”
कमला देवी कुछ पल के लिए चुप रह गईं। शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि नेहा इस तरह जवाब देगी।
उस दिन के बाद नेहा ने धीरे-धीरे अपनी आदत बदल दी। वह अब हर बात पर तुरंत काम करने के बजाय पहले अपनी जरूरतों का भी ध्यान रखने लगी।
अगर वह थकी होती तो आराम कर लेती। अगर उसे किसी बात से परेशानी होती तो वह शांति से अपनी बात कह देती।
शुरू-शुरू में कमला देवी को यह सब अजीब लगा। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी समझ में आने लगा कि नेहा सिर्फ बहू नहीं, इस घर की एक इंसान भी है।
कुछ हफ्तों बाद एक दिन कमला देवी ने खुद नेहा से कहा,
“बहू, आज तुम आराम कर लो। खाना मैं बना लूंगी।”
नेहा ने हैरानी से उनकी तरफ देखा और मुस्कुरा दी।
क्योंकि इस बार उसने घर छोड़कर नहीं, बल्कि खुद की कीमत समझकर अपनी जिंदगी बदल दी थी।।”

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