मेहमान......
राजू अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ घर लौट रहा था मगर वापसी में मिली खटारा बस ने तीन की जगह पांच घंटे से भी अधिक का समय ले लिया था और जहां वह आठ बजे रात तक पहुंचने वाले थे वही अब ग्यारह पार हो चुके थे .....असल मे पत्नी की मौसी के यहां एक जन्मदिन का प्रोग्राम था कितनी बार आने का न्योता दिया था मगर काम की व्यस्तता के कारण राजू परिवार सहित नही जा पा रहा था इसबार छुट्टी के अवसर पर जन्मदिन का प्रोग्राम था तो चला गया परिवार सहित ....सफर दूसरे शहर तक था सो बस से आना जाना पड़ता था बस वही से आते वक्त लेट हो गए....चूंकि अपने शहर वापसी पहुँचते-पहुँचते रात के ग्यारह बज गए थे तो दोनों बच्चे भूखे और निंदियासे हो रहे थे.....बस अड्डे के पास एक बड़ा सा रेस्टोरेंट दिखा भी पर उनमें जाने की इजाजत जेब ने नहीं दी और जो छोटे ढ़ाबे-होटल थे वो अब तक बन्द हो चुके थे....
अपने बजट वाले होटल की खोज बीन जारी थी... अच्छा... ..जैसा की इन मामलों में बच्चों का दिमाग बड़ा तेज़ चलता है तो वह बोले..."पापाजी बुध बाजार चौक के सामने मुरलीमोहन होटल खुला होगा...वहीं चलते है...
कया....वो....लुटेरा कहीं का....नही....बिल्कुल नहीं.....
राजू के ऐसा कहते ही पत्नी सहित दोनों बच्चों ने मुंह बना लिया....
राजू का मन तो बिल्कुल नहीं किया उस लुटेरे के यहां जाने का पर .....वैसे आस-पास के सारे छोटे-मोटे होटलों में सबसे महँगा खाना उसी का होता है ....और भीड़ ....भीड क्या मारामारी होती है, खाने के लिए...
एक बार तो राजू की भी तू-तू, मैं-मैं हो गई थी खाने में देरी को लेकर...
बस फिर कभी गया ही नही था गुस्से के चलते.... पर अब तो मजबूरी थी चारों वहां पहुँचे देखा, बाहर पटरी पर ही नौकर ये बड़े-बड़े कुकर, भिगोने, थाल रगड़ने में जुटे हुए थे...
अंदर झाँका टेबल के ऊपर कुर्सियाँ औंधी पड़ी थी फिर भी राजू पूछ बैठा....
"खाने का बन्दोबस्त हो जाएगा क्या....
नहीं जी अब तो सब खत्म हो गया....नौकर उनकी तरफ देखे बिना ही भिगोना रगड़ते-रगड़ते मुंह बना के बोला....
मलिक करेला तो नौकर नीम चढ़े.... जानता था यही होगा बुदबुदाते पत्नी बच्चों सहित राजू आगे चल दिया.. तभी......पीछे से किसी ने आवाज़ दी...
रुकिये....सबने मुड़ कर देखा होटल का वही लुटेरा मालिक मोहन पुकार रहा था....खाने का प्रबंध हो जाएगा आप लोग अंदर बैठिए....
राजू पत्नी बच्चों सहित वापस आ गया ...
टेबल से चार कुर्सियां उतार कर आमने-सामने लगा दी गई जिसपर चारों बैठ गये....
इस समय बस डोसा ही बन पायेगा....मलिक बोला
कोई नहीं, चलेगा....चार प्लेट डोसे की लगवा दीजिये....राजू ने कहा....खाने के बाद राजू ने बिल मांगा.... उसे पता था ऐसे में ये समय एक्स्ट्रा चार्ज तो वसूलेगा ...खैर देना तो पडेगा....
जी कैसा बिल....होटल मालिक मोहन बोला...
अरे भाई चार डोसों का बिल...राजू फिर से बोला होटल मालिक मोहन अंदर आते हुए बोला...."देखो जी... ना तो मैं अब गल्ले पर बैठा हूँ और ना ही होटल खुला हुआ है ...और आप इस समय मेरे ग्राहक नहीं मेहमान हो और मेहमानों से कोई पैसे नहीं लेता....राजू कितनी बार कहा पर भी वो नहीं माना पेट भर गया था....साथ ही मन भी भर आया...
राजू मन ही मन बोल रहा था ....
'लुटेरा कहीं का......
इस बार दिल जो लूट लिया था उसने सबका ....!!
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