iran esrael war

 दुनिया में मुसलमानों के 57 देश हैं... कभी सोचा है कि उनमें से एक देश ने भी ईरान का समर्थन क्यों नहीं किया? यहां तक पाकिस्तान भी?



ईरान आज मिसाइलें किन देशों पर मार रहा है? सऊदी अरब, UAE, बहरीन, कतर, ओमान, तुर्की... ये सभी मुस्लिम देश हैं।

ईरान चाहता तो इन देशों में मौजूद सिर्फ़ अमेरिकी सैन्य बेस पर हमला कर सकता है। लेकिन नहीं, उसने हमला किया सऊदी अरब के Aramco oil refinery पर, दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर, और अन्य सिविलियन बिल्डिंगों पर।

हिज़बुल्ला-हमास और हुतियों के आतंकियों को खामनेई ही सहयोग करता था।

पर हमारे यहां के कन्वर्टेडों को लगता है कि ईरान का समर्थन कर वो इस्लाम का साथ दे रहे हैं…रोलियाँ निकाल रहे हैं…

हमें याद रखना होगा कि ईरान पहले”पर्शिया” था,पारसी बहुल राष्ट्र था…वहां की जनता खामेनेई के खिलाफ सड़कों पर थी…

और खामेनेई की मौत पर ईरान के पूर्व प्रिंस रजा पहलवी ने तो यहां तक कहा है कि”शैतान मारा गया”

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खामेनेई की 'ठुकाई' और मोदी की 'खामोशी': ये नया भारत है बॉस!

दुनिया पूछ रही है कि ईरान के सुप्रीम लीडर के 'निपटने' पर विश्वगुरु ने शोक संदेश वाला ट्वीट क्यों नहीं दागा? लोग सन्नाटे का मतलब ढूंढ रहे हैं, पर सच तो ये है कि दिल्ली के दरबार में अब 'मातम' का ठेका बंद हो चुका है।

दुख व्यक्त क्यों करें भाई?

रिश्ते निभाने का दौर गया, अब सिर्फ 'किस्तें' देखी जाती हैं। मोदी और भारत के हिंदू को रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता कि तेहरान की गलियों में किसकी मैय्यत निकल रही है। हम तो बस इस ताक में हैं कि वहां अगली कुर्सी पर कौन बैठता है। हमारा विजन क्लियर है—दुख मनाना है या उनके 'मुंह पर थूकना' है, इसका फैसला अगली सरकार के व्यवहार और भारत के हितों पर टिका होगा।

हमें ईरान से 'इश्क' नहीं, 'बिजनेस' चाहिए:

भारत की नजरें अब उन 'नवनिर्माण' के ठेकों पर हैं जो अब तक चीनी कंपनियां डकार रही थीं। हमें वहां अपना नेटवर्क बिछाना है, ड्रैगन को खदेड़ना है और चाबहार के रास्ते बलोचिस्तान की रग-रग में अपनी पैठ बढ़ानी है। हमारा सीधा सा गणित है

UAE पर 'अफ़सोस' और ईरान पर 'खामोशी' का असली सच:

हां, मोदी ने UAE के किंग से बात की। ट्वीट भी किया और जनहानि पर गहरा दुख भी जताया। लिबरल जमात पूछ रही है ये दोहरा मापदंड क्यों?

जवाब सीधा और कड़वा है:

वहां लाखों की तादाद में हमारे हिंदू भाई रहते हैं। वहां हमारे खून-पसीने की कमाई और संस्कृति बसी है। खबर तो ये भी है कि वहां एक नेपाली हिंदू की जान गई है—और जब बात अपनों पर आती है, तो मोदी को भी दर्द होता है और हमें भी।

ईरान के मजहबी कट्टरपंथियों के लिए हमारे पास आंसू नहीं हैं, लेकिन खाड़ी में बसे अपने भाइयों की सुरक्षा के लिए हमारे पास संवेदना भी है और सामर्थ्य भी।

सीधी बात: हम अब 'उम्मा' के फर्जी भाईचारे में नहीं उलझते। हमें सिर्फ अपना हित दिखता है, अपनी सीमा दिखती है और अपना तिरंगा दिखता है। बाकी दुनिया जलती है तो जले, हमें बस अपना घर रोशन रखना है।

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