भरण-पोषण
भरण-पोषण
सरकारी सेवा में कार्यरत् उच्चाधिकारी मेरे पति का तबादला,उस शहर में हुआ,जिस शहर में मेरा बचपन गुजरा था,तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. पहली क्लास से लेकर बारहवीं क्लास तक मैंने यहीं पढ़ाई की थी.बाद में पिताजी का स्थान्तरण होने के कारण मजबूरन् यह शहर छोड़ना पड़ा.मैं अपने पति और बच्चों के साथ इस शहर में आ गई.शहर तो पुराना था,पर मैं जिस कॉलोनी में रहने आयी थी,वह मेरे लिये नई थी.पर मेरे मिलनसार स्वभाव के कारण जल्द ही मेरी नयी सहेलियाँ बन गयीं.और एक दिन अपनी सहेलियों के साथ मैं पास ही के निराश्रित वृद्घों के लिये बनाये गये वृद्धाश्रम में फळ बाँटने गई,तो एक बुजुर्ग महिला पर मेरी दृष्टि पड़ी.
'अरे ये तो सुलभा काकी हैं,जो बचपन में हमारे पड़ोस में रहती थीं.'-मेरे मन में स्मृति कौंधी.बस उनके काले और बेहद घुंघराले बाल,सफेद बालों में परिवर्तित हो चुके थे.और उम्र का असर उनके चेहरे से दिख रहा था.और वैसी ही दुबली-पतली.
"सुनिये आप सुलभा जी हैं?"मैंने उनसे पूछा.
"हाँ बिटिया,पर तुम कौन हो?मैंने तुम्हें पहचाना नहीं."सुलभा काकी ने मुझसे
प्रश्न किया.
"काकी,मैं शिल्पा हूँ.पं.गंगाधर चतुर्वेदी की बेटी,आपके पड़ौस में रहती थी."मैंने उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा.
"अरे हाँ,याद आया."ये सुलभा काकी के शब्द थे.
"पर काकी आप यहाँ कैसे?"मैं अपनी उत्सुकता दबा नहीं पायी.
"अरे बिटिया सब किस्मत का खेल है."सुलभा काकी ने रुँधे स्वर में कहा.
मैंने बड़ी आत्मीयता से उनका हाथ पकड़कर कहा-"ऐसा क्या हो गया काकी?"
सुलभा काकी अपने अतीत की गलियों के सफर में भटकते हुए मुझे अपनी व्यथा सुनाने लगीं.
-"शिल्पा बिटिया,तुम को तो पता ही थी,कि हमारे घर की आर्थिक स्थति.कैसे मैंने पेट काट-काट कर अपने बेटे को पढ़ाया था.जब वह बैंक में ऑफिसर बन गया,तो मैंने चैन की साँस ली कि अब मेरे दुख के दिन समाप्त हुए."काकी ने अपने आँखों में आये हुए आँसूओं को पोंछा.और अपनी बात जारी रखते हुए आगे बोलीं-"पर मुझे पता नहीं था कि आने वाले दिन और भी दुख से भरे होंगे.
बेटे की शादी की और चाँद-सी बहू भी आयी.पर मुझे पता नहीं था कि मेरी बहू का चेहरा तो उजला था,पर दिल काला था."वह कुछ पल रुकीं और फिर गहरी साँस लेते हुए बोलीं-"बहू अपने पति यानी मेरे बेटे को मुझ से अलग रहने को उकसाने लगी.वह मुझे ताने देती,मेरा अपमान करती.मुझे दो-दो दिन तक खाना नहीं देती.बेटे के ऊपर भी उस के रुप का ऐसा जादू चला कि वह भी पत्नि की हाँ में हाँ मिलाने लगा.वह भी मुझे गालियाँ देता.
और एक दिन पत्नि के भड़काने पर उसने मुझे धक्के मार-मार कर घर से निकाल दिया.यहाँ तक कि उसने मेरा सामान तक नहीं दिया.भीख तो मैं माँग नहीं सकती.किसी ने इस सरकारी वृद्घाश्रम का पता बताया,तो मैं यहाँ चली आयी."बिलखते हुए सुलभा काकी ने कहा.
उनकी व्यथा का हाल सुनकर मेरा दिल द्रवित हो उठा.
रात को मैंने यह बात अपने पति को बताई,तो उनका मन भी व्यथित हो उठा.
अगले दिनू मैं,और मेरे पति, सुलभा काकी को वृद्घाश्रम से लेकर उनके बेटे के घर पहुँचे.सुलभा काकी को देखते ही उनके बेटे और बहू आग-बबूला हो गयेेे.और उनसे गाली-गलौज करने लगे.सुलभा काकी के साथ इस दुर्व्यहार को देख मेरे पति बोले-"अब तो इन से कोर्ट में ही निबटना पड़ेगा,तभी इन दोनों की अक्ल ठिकाने आयेगी."
मेरे पति ने अपने वकील मित्र की सहायता ली.वकील साहब ने सुलभा काकी के बेटे पर,सेक्शन १२५ के तहत,सुलभा काकी को भरण-पोषण देने के लिये केस कर दिया.केस का परिणाम भी शीघ्र आ गया.सुलभा काकी के बेटे को, मजिस्ट्रेट ने उसकी आय को देखते हुए हर महीने सात हजार रुपये देने का आदेश दिया.जो कि उसकी तनख्वाह से कटकर सीधे सुलभा काकी के अकाउंट में जाता था.कलियुगी बेटे और बहू को कोर्ट ने अच्छा सबक सिखाया था.
सुलभा काकी खुशी के आँसूओं से तरबतर होकर बड़े ही भावुक स्वर मेरे पति से बोलीं-"दामाद बाबू,आप तो देवता हो देवता.जो आपने मुझ ,बूढ़ी अकेली विधवा के लिये इतना सब कुछ किया.मैं इस जन्म में तो क्या,अगले सात जन्मों तक आपका उपकार नहीं चुका सकती."
"काकी,आप इस उपकार को इसी जन्म में और अभी चुका सकती हैं.आप को मेरे साथ रहना होगा,मेरी माँ और मेरे बच्चों की नानी माँ बनकर."मैंने अधिकार भरे स्वर में सुलभा काकी से कहा,और अपने पति की ओर देखा.वे भी मुस्कराकर और अपना सिर हिलाकर मेरे इस निर्णय का समर्थन कर रहे थे.
सुलभा काकी ने अपने पूरे जीवन में घोर अपमान,यांत्रणा और तिरस्कार झेला था,उन्हेंअब बुढ़ापे में आदर,सम्मान और प्यार की चाह थी,जो उन्हें मेरे और मेरे परिवार से भरपूर मिल रही थी.
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