घर जैसा खाना
सविता जी और उनके पति रामनाथ गोयनका दोनों अपने फ्लैट में अकेले रहते थे एक बिटिया थी,जो विवाह कर अपने पति के साथ,सात समंदर पार विदेश में बस गई थी.
शाम को अचानक तेज़ बुखार आ गया रामनाथ जी को सूखी खाँसी,और बदन दर्द से दोहरा.दो-चार दिन बाद उन्होंने अपना टेस्ट करवाया. जैसी की आशंका थी,वे कोविड पॉज़ीटिव निकले.डॉ.ने उन्हें दवाईयाँ देकर 'होम-आइसोलेशन' में रहने की सलाह दी.
पर बात यहीं तक सीमित नहीं रही.तीसरे दिन सविता जी भी कोरोना से ग्रसित हो गईं.अब समस्या आई कि खाना कौन बनाये?
पास-पड़ौस से तो कोई उम्मीद ही नहीं थी.पड़ौसी व्हॉट्स अप पर ये जानकर कि गोयनका दंपत्ति कोरोना पॉजीटिव हैं,तो वे सीधा कन्नी काट गये.ऐसा व्यवहार करने लगे कि जैसे गोयनका दंपत्ति अछूत हों.
मजबूर होकर उन्होंने 'टिफिन' मंगवाना शुरु किया.पर 'टिफिन' का खाना देखकर तो वे दंग रह गये.इतना तला-भुना,मिर्च-मसालों से युक्त भोजन उनके गले नहीं उतर रहा था.पर मरता क्या न करता,आँखों में आँसू भरकर उन दोनों ने ऐसा भोजन तब तक खाया,जब तक कि उनकी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव नहीं आई.कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आने पर उन्होंने राहत की साँस ली.
घर जैसा खाना खाने की चाह रखने वाले वाले इस दंपत्ति के मन में एक योजना आई.उन्होंने आपस में सलाह-मशवरा करके योजना को असली जामा पहनाने का निश्चय किया.
सविता जी और रामनाथ जी ने क्रमश: अपने-अपने वॉट्सअप ग्रुपों में जिनसे वे जुड़े थे. एक सूचना डाली.पहिले दिन ही दो आर्डर आये.सविता जी ने अपनी सहायिका की सहायता से खाना बनाया और उसे डिस्पोजेबल बॉक्स में पैक किया.और खाना पहुँचाने का काम रामनाथ जी ने संभाला.अब तो दो से चार,चार से आठ,आठ से दस आर्डर खाने के आने लगे.सविता जी ने अपनी सहायिकाओं की संख्या में वृद्धि की. चूँकि कोरोना के मरीज़ के खाने में प्रोटीन की मात्रा अधिक होनी चाहिये.इसलिये सविता जी ने ऐसी सब्ज़ियाँ बनानी शुरू कीं,जिसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक हों.कभी सोया-बड़ी की सब्ज़ी,तो कभी राजमा और सेम की सब्ज़ी भीऔर इन सब्ज़ियों के साथ-साथ गर्मा-गर्म दाल-चावल,रोटियाँ और सलाद तो होता ही था. एकदम ताजा,सुस्वादु पौष्टिक और घर जैसा भोजन,भेजती थीं,सविता जी आर्डर करने वालों को.
ऑडर्स बढ़ने लगे. और सविता जी का किचन छोटा पड़ने लगातो उन्होंने सोसायटी के अध्यक्ष से सोसायटी के 'क्लब हाऊस' में खाना बनाने की अनुमति माँगी.अध्यक्ष महोदय ने इस पुण्य कार्य के लिये तुरंत 'हाँ' कर दी.
कोरोना से ठीक हुए कुछ लोगों ने अपनी स्वेच्छा से धन-राशि भी 'दान' के रुप दी.जिसे अनिच्छा से ही सही गोयनका दंपत्ति ने स्वीकार कर लिया,क्यूँकि इतने लोगों का खाना बनाने में पैसा तो लगता ही है.और गोयनका दंपत्ति के पास तो कोई 'कुबेर का ख़ज़ाना' तो था नहीं.इस दान के पैसे से खाना बनाने के लिये बड़े बर्तन ख़रीदे गये.राशन और साग-सब्ज़ियाँ ख़रीदने में रुपयों की क़िल्लत अब ख़त्म हो चुकी थी.
गोयनका दंपत्ति के द्वारा किये जा रहे इस नेक काम को देखकर पास-पड़ौस के फ्लैट्स में रहने वाले लोगों में भी जागरुकता आयी.वो भी सहयोग करने लगे.महिलायें आटा गुंथवाने में,रोटियाँ बनाने में और सब्ज़ी-भाजी कटवाने में सहायता करतीं.तो पुरुष वर्ग बक़ायदा चेहरे पर मास्क,हाथ में दस्ताने और सिर पर केप पहनकर बने हुए भोजन को डिस्पोजेबल बॉक्स में पैक करते.युवा वर्ग भी पीछे नहीं था,उन्होंने भी पैक किये हुए भोजन को,भोजन का आर्डर देने वाले लोगों के पास पहुँचाने का भार सहर्ष अपने कंधों पर उठा लिया. एक टीम-सी बन गई थी.
कहाँ दो आर्डर से शुरु हुआ काम अब चालीस से पचास आडर्स तक पहुँच गया था.गोयनका दंपत्ति ख़ुश थे,संतुष्ठ थे.क्योंकि उन्हीं के प्रयासों से कोरोना के मरीज़ों को घर जैसा और पौष्टिक भोजन मिल रहा था.और साथ में उन्हें मिल रही थीं, उन कोरोना से पीड़ित लोगों की दुआयें,जिन्हें घर बैठे ऐसा भोजन मिल रहा था,वह भी मुफ्त.गोयनका दंपत्ति वाकई इन दुआओं के हक़दार भी थे, क्योंकि उन्होंने काम ही ऐसा किया था.
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